Loading

Enquiry
articale
digital advertising
Contact Form

मध्य प्रदेश स्थित खजुराहो मंदिर

खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्व प्रसिद्ध है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में है। खजुराहो को प्राचीन काल में खजूरपुरा अथवा खजूर वाहिका के नाम से भी जाना जाता था। यहां बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू तथा जैन मंदिर हैं। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए जाना जाता है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों के कारण ही  जाना जाता है जो देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। भारत के अलावा दुनियाभर के आगन्तुक तथा पर्यटक प्रेम के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए आते रहते है। हिन्दू कला, संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था। संभोग की अनेकों कलाओं को इन मंदिरों में बहुत  खूबसूरती के उभारा गया है।

खजुराहों का इतिहास
खजुराहो का इतिहास करीब एक हजार वर्ष पुराना है। यह शहर चन्देल साम्राज्‍य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश व खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे। चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने वाले राजपूत राजा थे। वे खुद को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया था। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के मध्य इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के पश्चात चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी थी। लेकिन इसके पश्चात खजुराहो का महत्व बना रहा।
मध्यकाल के दरबारी कवि चन्द्रवरदायी ने पृथ्वीराज रासो के महोबा खंड में चन्देल की उत्पत्ति का वर्णन किया। उन्होंने लिखा था कि काशी के राजपंडित की पुत्री हेमवती अपूर्व सौंदर्य की धनी थी। एक दिन वह गर्मियों की रात्रि में कमल पुष्पों से भरे तालाब में स्नान कर रही थी। उसकी सुंदरता देखकर भगवान चन्द्र उन पर मोहित हो गए। वे मानव रूप धरकर धरती पर आ गए और हेमवती का हरण कर लिया। दुर्भाग्य से हेमवती विधवा थी। वह एक बच्चे की मां भी थी। उन्होंने चन्द्रदेव पर अपना जीवन नष्ट करने तथा चरित्र हनन का आरोप लगाया।
अपनी गलती के पश्चाताप हेतु चन्द्रदेव ने हेमवती को वचन दिया कि वह एक वीर पुत्र की मां बनेगी। चन्द्रदेव ने कहा कि वह अपने पुत्र को खजूरपुरा ले जाए। उन्होंने कहा कि वह एक महान राजा बनेगा। राजा बनने पर वह बाग तथा झीलों से घिरे हुए अनेक मंदिरों का निर्माण करवाएगा। चन्द्रदेव ने हेमवती से कहा कि राजा बनने पर तुम्हारा पुत्र एक विशाल यज्ञ का आयोजन भी करेगा जिससे तुम्हारे समस्त पाप धुल जाएंगे। चन्द्र के निर्देशों का पालनकर हेमवती ने पुत्र को जन्म देने हेतु अपना घर छोड़ दिया और एक छोटे-से गांव में अपने पुत्र को जन्म दिया।
हेमवती का बेटा चन्द्रवर्मन अपने पिता की भांति तेजस्वी, बहादुर तथा शक्तिशाली था। सोलह वर्ष की आयु में वह बिना हथियार के शेर या बाघ को मार सकता था। बेटे की असाधारण वीरता को देखकर हेमवती ने चन्द्रदेव की आराधना की जिन्होंने चन्द्रवर्मन को पारस पत्थर भेंट किया और उसे खजुराहो का राजा बना दिया। पारस पत्थर से लोहे को सोने में परिवर्तित किया जा सकता था।
चन्द्रवर्मन ने निरन्तर कई युद्धों में शानदार विजय प्राप्त की। उसने कालिंजर का विशाल किला भी बनवाया। माता के कहने पर चन्द्रवर्मन ने तालाबों तथा उद्यानों से आच्छादित खजुराहो में 85 अद्वितीय मंदिरों का निर्माण करवाया व एक यज्ञ का आयोजन किया जिसने हेमवती को पापमुक्त कर दिया था। चन्द्रवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों ने खजुराहो में अनेक मंदिरों को बनवाया।

खजुराहो का पश्चिमी समूह
ब्रिटिश इंजीनियर टीएस बर्ट ने खजुराहो के मंदिरों की खोज की तभी से मंदिरों के एक विशाल समूह को 'पश्चिमी समूह' के नाम से जाना जाता है। यह खजुराहो के सबसे अधिक आकर्षक स्थानों में से एक है। इस स्थान को युनेस्को ने सन 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है। इसका अर्थ यह है कि अब समस्त विश्व इसकी मरम्मत तथा देखभाल के लिए उत्तरदायी होगा। शिवसागर के निकट स्थित इन पश्चिम समूह के मंदिरों के दर्शन के साथ अपनी यात्रा आरम्भ करनी चाहिए। एक ऑडियो हैडसेट 50 रूपये में टिकट बूथ से 500 रूपये जमा करके पाया जा सकता है।
इसके अलावा दो सौ रूपये से तीन रूपये के मध्य आधे या पूरे दिन में चार लोगों के लिए गाइड सेवाएं भी ली जा सकती हैं। खजुराहो को साइकिल के माध्यम से अच्छी तरह से देखा जा सकता है। यहां साइकिलें 20 रूपये प्रति घंटे की दर से पश्चिम समूह के निकट स्टैंड से प्राप्त की जाती है।
इस परिसर के विशाल मंदिरों की बहुत अधिक सजावट की गई है। यह सजावट यहां के शासकों की संपन्नता और शक्ति को दर्शाती है। इतिहासकारों का मत है कि इनमें हिन्दू देवकुलों के प्रति भक्ति भाव दर्शाया गया है। देवकुलों के रूप में या तो शिव या विष्णु को दर्शाया गया है। इस परिसर में स्थित लक्ष्मण मंदिर उच्च कोटि का मंदिर है। इसमें भगवान विष्णु को बैकुंठम के समान बैठा हुआ दिखाया गया है। चार फुट ऊंची विष्णु की इस मूर्ति में तीन सिर हैं। ये सिर मनुष्य, सिंह और वराह के रूप में दर्शाए गए हैं। कहा जाता है कि कश्मीर के चम्बा क्षेत्र से इसे मंगवाया गया था। इसके तल के बाएं भाग में आम लोगों के प्रतिदिन के जीवन के क्रियाकलापों, कूच करती हुई सेना, घरेलू जीवन व नृतकों को दिखाया गया है।
मंदिर के प्लेटफार्म की चार सहायक वेदियां हैं। 954 ईसवीं में बने इस मंदिर का संबंध तांत्रिक संप्रदाय से है। इसका अग्रभाग दो तरह की मूर्तिकलाओं से सजा है जिसके मध्य खंड में मिथुन या आलिंगन करते हुए दंपत्तियों को दर्शाता है। मंदिर के सामने दो लघु वेदियां भी हैं। एक देवी तथा दूसरा वराह देव को समर्पित है। विशाल वराह की आकृति पीले पत्थर की चट्टान के एकल खंड में निर्मित है।

खजुराहो का कंदरिया महादेव मंदिर
कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशाल है। यह अपनी भव्यता और संगीतमयता की वजह से  प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण महान चन्देल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में किया था। करीब 1050 ईसवीं में इस मंदिर को बनवाया गया था। यह एक शैव मंदिर है। तांत्रिक समुदाय को खुश करने के लिए इसका निर्माण किया गया था। कंदरिया महादेव मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है। मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन भी हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के मुताबिक यहां सबसे अधिक मिथुनों की आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियां तथा अंदर 246 आकृतियों की गणना की थीं।

खजुराहो का देवी जगदम्बा मंदिर
कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर स्थित है। जगदम्बा देवी का मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था इसका निर्माण 1000 से 1025 ईसवीं के मध्य किया गया था। सैकड़ों सालों बाद  यहां छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई थी इस कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहां पर उत्कीर्ण मैथुन मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता शिल्प की विशेषता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए भी प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का तथा  सिर तोते, हाथी या वराह का होता था।

खजुराहो का सूर्य (चित्रगुप्त) मंदिर
खजुराहो में एकमात्र सूर्य मंदिर है जिसका नाम चित्रगुप्त है। चित्रगुप्त मंदिर एक ही चबूतरे पर स्थित चौथा मंदिर है। इसका निर्माण भी विद्याधर के काल में ही हुआ था। इसमें भगवान सूर्य की सात फुट ऊंची प्रतिमा कवच धारण किए हुए स्थित है। इसमें भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें एक मूर्तिकार को कार्य करते हुए कुर्सी पर बैठा दिखाया गया है। इसके अलावा एक ग्यारह सिर वाली विष्णु की मूर्ति भी दक्षिण की दीवार पर स्थापित है।
बगीचे के मार्ग में पूर्व की तरफ पार्वती मंदिर स्थित है। यह एक छोटा-सा मंदिर है जो विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर को छतरपुर के महाराजा प्रताप सिंह द्वारा 1843-1847 ईसवीं के मध्य बनवाया गया था। इसमें पार्वती की आकृति को गोह पर चढ़ा हुआ दिखाया गया है। पार्वती मंदिर के दायीं ओर विश्वनाथ मंदिर है जो खजुराहो का विशाल मंदिर है। यह मंदिर शंकर भगवान से संबंधित है। यह मंदिर राजा धंग द्वारा 999 ईसवीं में बनवाया गया। चिट्ठियां लिखती अपसराएं, संगीत का कार्यक्रम तथा एक लिंगम को इस मंदिर में दर्शाया गया है।


खजुराहो का विश्वनाथ मन्दिर
शिव मंदिरों में अत्यंत महत्वपूर्ण विश्वनाम मंदिर का निर्माण काल सन् 1002- 1003 ई. है। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर बहुत सुंदरों में से एक है। इस मंदिर का नामकरण शिव के एक और नाम विश्वनाथ पर किया गया है। मंदिर की लंबाई 89' और चौड़ाई 45' है। पंचायतन शैली का यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ गर्भगृह के केंद्र में नंदी पर आरोहित शिव प्रतिमा स्थापित की गयी है।

खजुराहो में प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम
शाम को इस परिसर में अमिताभ बच्चन की आवाज़ में लाईट एंड साउंड कार्यक्रम प्रद्रर्शित किया जाता है। यह कार्यक्रम खजुराहो के इतिहास को और भी जीवन्त कर देता है। इस कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए भारतीय नागरिक से प्रवेश शुल्क 50 रूपये और विदेशियों से 200 रूपये का शुल्क लिया जाता है। सितम्बर से फरवरी के मध्य अंग्रेजी में यह कार्यक्रम शाम 7 बजे से 7:50 तक होता है जबकि हिन्दी का कार्यक्रम रात आठ से नौ बजे तक आयोजित किया जाता है। मार्च से अगस्त तक इस कार्यक्रम का वक्त बदल जाता है। इस अवधि में अंग्रेजी कार्यक्रम शाम 7:30 -8:20 के मध्य होता है। हिन्दी भाषा में वक्त बदलकर 8:40 - 9:30 हो जाता है।

खजुराहो का पूर्वी समूह
पूर्वी समूह के मंदिरों को दो विषम समूहों में विभाजित किया गया है। जिनकी उपस्थिति आज के गांधी चौक से शुरू हो जाती है। इस श्रेणी के पहले चार मंदिरों का समूह प्राचीन खजुराहो गांव के निकट है। दूसरे समूह में जैन मंदिर हैं जो गांव के स्कूल के पीछे हैं। पुराने गांव के दूसरे छोर पर स्थित घंटाई मंदिर को देखने के साथ यहां के मंदिरों का भ्रमण आरम्भ किया जा सकता है। निकट ही वामन और जायरी मंदिर भी दर्शनीय हैं। 1050 से 1075 ईसवीं के मध्य वामन मंदिर का निर्माण किया गया था। विष्णु के अवतारों में इसकी गणना की जाती है। निकट ही जायरी मंदिर हैं जिनका निर्माण 1075-1100 ईसवीं के मध्य माना जाता है। यह मंदिर भी विष्णु भगवान को समर्पित है। इन दोनों मंदिरों के निकट ब्रह्मा मंदिर हैं जिसकी स्‍थापना 925 ईसवीं में हुई थी। इस मंदिर में एक चार मुंह वाला लिंगम है। ब्रह्मा मंदिर का संबंध ब्रह्मा से न होकर भगवान शिव से है।


खजुराहो का जैन मंदिर
इन मंदिरों का समूह एक कम्पाउंड में है। जैन मंदिरों को दिगम्बर सम्प्रदाय ने बनवाया था। यह सम्प्रदाय इन मंदिरों की देखभाल करता है। इस समूह का सबसे बड़ा मंदिर र्तीथकर आदिनाथ को समर्पित है। आदिनाथ मंदिर पार्श्‍वनाथ मंदिर के उत्तर में है। जैन समूह का अन्तिम शान्तिनाथ मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर में यक्ष दंपत्ति की आकर्षक मूर्तियां भी हैं।

खजुराहो का दक्षिणी समूह
इस हिस्से में दो मंदिर हैं। एक भगवान शिव से संबंधित दुलादेव मंदिर है तथा दूसरा विष्णु से संबंधित है जिसे चतुर्भुज मंदिर भी कहा जाता है। दुलादेव मंदिर खुद्दर नदी के किनारे स्थित है। इसे 1130 ईसवी में मदनवर्मन ने  बनवाया गया था। इस मंदिर में खंडों पर मुंद्रित दृढ़ आकृतियां हैं। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण 1100 ईसवीं में किया गया था। इसके गर्भ में 9 फुट ऊंची विष्णु की प्रतिमा को संत के वेश में दिखाया गया है। इस समूह के मंदिर को देखने लिए दोपहर का वक्त अच्छा माना जाता है। दोपहर में पड़ने वाली सूर्य की रोशनी इसकी मूर्तियों को और भी आकर्षक बनाती है।

खजुराहो का चतुर्भुज मंदिर
यह मंदिर जटकारा ग्राम से करीब आधा किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यह विष्णु मंदिर निरधार तरह का है। इसमें अर्धमंडप, मंडप, संकीर्ण अंतराल के साथ गर्भगृह है। इस मंदिर की योजना सप्ररथ है। इस मंदिर का निर्माणकाल जवारी तथा दुलादेव मंदिर के निर्माणकाल के बीच माना जाता है। बलुवे पत्थर से निर्मित खजुराहो का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन प्रतिमाओं का सर्वथा अभाव दिखाई पड़ता है। सामान्य रुप से इस मंदिर की शिल्पकला अवनति का संकेत करती है। मूर्तियों के आभूषण में रेखाकन मात्र हुआ है और इनका सूक्ष्म अंकन अपूर्ण छोड़ दिया गया है। यहाँ की पशु की प्रतिमाएँ एवं आकृतियाँ अपरिष्कृत तथा अरुचिकर है। अप्सराओं समेत अन्य शिल्प विधान रुढिगत हैं, जिसमें सजीवता तथा भावाभिव्यक्ति का अभाव माना जाता है। फिर भी, विद्याधरों का अंकन आकर्षक और मन को लुभाने वाली मुद्राओं में किया गया है। इस प्रकार यह मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के आधार पर सबसे बाद में निर्मित दुलादेव के निकट निर्मित  माना जाता है।
चतुर्भुज मंदिर के द्वार के शार्दूल सर्पिल तरह के हैं। इसमें कुछ सुरसुंदरियाँ अधबनी ही छोड़ दी गयी हैं। मंदिर की ज्यादातर अप्सराएँ और कुछ देव दोहरी मेखला धारण किए हुए अंकित किए गए हैं तथा मंदिर की रथिकाओं के अर्धस्तंभ बर्तुलाकार बनाए गए हैं। ये सारी विशेषताएँ मंदिर के परवर्ती निर्माण सूचक हैं।


खजुराहो स्थित दुलादेव मन्दिर
यह शिव मंदिर है। इसको कुछ इतिहासकार कुंवरनाथ मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माणकाल लगभग सन् 1000 ई. है। मंदिर का आकार 69 न् 40' है। यह मंदिर प्रतिमा वर्गीकरण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मंदिर है। निरंधार प्रासाद प्रकृति का यह मंदिर अपनी नींव योजना में समन्वित प्रकृति का है। मंदिर सुंदर प्रतिमाओं से सज्जित है। इसमें गंगा की चतुर्भुज प्रतिमा बहुत ही सुंदर ढ़ंग से अंकित की गई है। यह प्रतिमा इतनी आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक है कि लगता है कि यह अपने आधार से अलग होकर आकाश में उड़ने का प्रयास कर रही है। मंदिर की भीतरी बाहरी हिस्से में अनेक प्रतिमाएँ अंकित की गई है, जिनकी भावभंगिमाएँ सौंदर्यमयी, दर्शनीय और उद्दीपक है। नारियों, अप्सराओं तथा मिथुन की प्रतिमाएँ, इस प्रकार अंकित की गई है कि सब अपने अस्तित्व के लिए सजग है। भ्रष्ट मिथुन मोह भंग भी करते हैं, फिर अपनी विशेषता से हैरान भी कर देते हैं।
इस मंदिर के पत्थरों पर "वसल' नामक कलाकार का नाम अंकित हुआ मिला है। मंदिर के वितान गोलाकार तथा स्तंभ अलंकृत हैं और नृत्य करती प्रतिमा सुंदर एवं आकर्षक हैं। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग योनि- वेदिका पर स्थापित किया गया है। मंदिर के बाहर मूर्तियाँ तीन पट्टियों पर अंकित की गई हैं। यहाँ हाथी, घोड़े, योद्धा तथा  सामान्य जीवन के अनेक दृश्य प्रस्तुत किये गए हैं। अप्सराओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि वे स्वतंत्र, स्वच्छंद तथा निर्बाध जीवन का प्रतीक जान पड़ती है।
इस मंदिर की खासियत यह है कि अप्सरा टोड़ों में अप्सराओं को दो- दो, तीन- तीन के समूह में दर्शाया गया है। मंदिर, मण्डप, महामंडप व मुखमंडप से युक्त है। मुखमंडप हिस्से में गणेश और वीरभद्र की प्रतिमाएँ अपनी रशिकाओं में इस तरह अंकित की गई है कि झांक रही दिखती है। यहाँ की विद्याधर और अप्सराएँ गतिशील हैं। परंतु सामान्यतः प्रतिमाओं पर अलंकरण का भार ज्यादा दिखाई देता है। प्रतिमाओं में से कुछ प्रतिमाओं की कलात्मकता दर्शनीय एवं सराहनीय है। अष्टवसु मगरमुखी है। यम तथा नॠत्ति की केशसज्जा परंपराओं से अलग पंखाकार है।
मंदिर की जगती 5' उँची है। जगती को सुंदर तथा दर्शनीय बनाया गया है। जंघा पर प्रतिमाओं की पंक्तियाँ स्थापित की गई हैं। प्रस्तर पर पत्रक सज्जा भी है। देवी देवता, दिग्पाल व अप्सराएँ छज्जा पर मध्य पंक्ति देव तथा मानव युग्लों एवं मिथुन से सजाया गया है। भद्रों के छज्जों पर रथिकाएँ हैं। वहाँ देव प्रतिमाएँ हैं। दक्षिणी भद्र के कक्ष- कूट पर गुरु शिष्य की प्रतिमा अंकित की गई है।
शिखर सप्तरथ मूल मंजरी से युक्त है। यह भूमि आम्लकों से सुसज्जित किया गया है। उरु: श्रृंगों में से दो सप्तरथ व एक पंच रथ प्रकृति का है। शिखर के प्रतिरथों पर श्रृंग हैं, किनारे की नंदिकाओं पर दो श्रृंग हैं तथा प्रत्येक करणरथ पर तीन- तीन श्रृंग हैं। श्रृंग समान आकार के हैं। अंतराल हिस्से का पूर्वी मुख का उग्रभाग सुरक्षित है। जिसपर नौं रथिकाएँ बनाई गई हैं, जिनपर नीचे से ऊपर की तरफ उद्गमों की चार पंक्तियाँ हैं। आठ रथिकाओं पर शिव पार्वती की प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं। स्तंभ शाखा पर तीन रथिकाएँ हैं, जिनपर शिव प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं, जो परंपरा के मुताबिक ब्रह्मा और विष्णु से घिरी हैं। भूत नायक प्रतिमा शिव प्रतिमाओं के नीचे हैं, जबकि विश्रांति हिस्से में नवग्रह प्रतिमाएँ खड़ी मुद्रा में हैं। इस स्तंभ शाखा पर जल देवियाँ त्रिभंगी मुद्राओं में है। मगर और कछुआ भी यहाँ सुंदर तरह से अंकित किया गया है। मुख प्रतिमाएँ गंगा, यमुना की प्रतीक मानी जाती है। शैव प्रतिहार प्रतिमाओं में एक प्रतिमा महाकाल भी है, जो की खप्पर युक्त है।
मंदिर के बाहरी हिस्से की रथिकाओं में दक्षिणी मुख पर नृत्य मुद्रा में छः भुजा युक्त भैरव, बारह भुजायुक्त शिव तथा एक अन्य रथिका में त्रिमुखी दश भुजायुक्त शिव मूर्ति है। इसकी दीवार पर बारह भुजा युक्त नटराज, चतुर्भुज, हरिहर, उत्तरी मुख पर बारह भुजा युक्त शिव, अष्ट भुजायुक्त विष्णु, दश भुजा युक्त चौमुंडा, चतुर्भुज विष्णु गजेंद्रमोक्ष रुप में तथा शिव पार्वती युग्म मुद्रा में है। पश्चिमी मुख पर चतुर्भुज नग्न नॠति, वरुण के अतिरिक्त वृषभमुखी वसु की दो प्रतिमाएँ हैं। उत्तरी मुख पर वायु की भग्न प्रतिमा के अलावा वृषभमुखी वसु की तीन व चतुर्भुज कुबेर तथा ईशान की एक- एक प्रतिमा अंकित की गई है।

खजुराहो का संग्रहालय
खजुराहो के विशाल मंदिरों को टेड़ी गर्दन से देखने के पश्चात तीन संग्रहालयों को देखा जा सकता है। वेस्टर्न ग्रुप के विपरीत स्थित भारतीय पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में मूर्तियों को अपनी आंख के स्तर पर देखा जा सकता है। पुरातत्व विभाग के इस संग्रहालय को चार विशाल गृहों में बांटा गया है जिनमें शैव, वैष्णव, जैन तथा 100 से ज्यादा विभिन्न आकारों की मूर्तियां हैं। संग्रहालय में विशाल मूर्तियों के समूह को कार्य करते हुए दिखाया गया है। इसमें विष्णु की प्रतिमा को मुंह पर अंगुली रखे चुप रहने के भाव के साथ दिखाया गया है। संग्रहालय में चार पैरों वाले शिव की भी एक सुन्दर प्रतिमा है।
जैन संग्रहालय में करीब 100 जैन मूर्तियां हैं। जबकि ट्राईबल तथा फॉक के राज्य संग्रहालय में जनजाति समूहों द्वारा निर्मित पक्की मिट्टी की कलाकृतियां, धातु शिल्प, लकड़ी शिल्प, पेंटिंग, आभूषण, मुखौटों और टेटुओं को भी दर्शाया गया है।
भारतीय पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में प्रवेश शुल्क 5 रूपये है। वेस्टर्न ग्रुप के टिकट के साथ इस संग्रहालय में फ्री प्रवेश किया जा सकता है। सुबह दस से शाम साढे चार बजे तक यह संग्रहालय खुला रहता है। शुक्रवार को यह संग्रहालय बन्द रहता है। शुल्‍क जैन संग्रहालय सुबह सात बजे से शाम छ: बजे तक खुला होता है और इसमें कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता।
राज्य संग्रहालय में शुल्क के रूप में 20 रूपये लिए जाते हैं। यह दोपहर बारह बजे से शाम आठ बजे तक खुला होता है। सोमवार तथा सार्वजनिक अवकाश वाले दिन यह बन्द रहता है।

खजुराहो के निकटवर्ती दर्शनीय स्थल
खजुराहो के आसपास अनेक ऐसे स्थल हैं जो पर्यटन और भ्रमण के लिहाज से बहुत प्रसिद्ध हैं।

खजुराहो में कालिंजर और अजयगढ़ का दुर्ग
मैदानी क्षेत्रों से थोड़ा आगे बढ़कर विन्ध्य के पहाड़ी भागों में अजयगढ़ और कालिंजर के किले हैं। इन किलों का संबंध चन्देल वंश के उत्थान और पतन से है। 105 किलोमीटर दूर स्थित कालिंजर का किला है। यह एक प्राचीन किला है। प्राचीन काल में यह शिव भक्तों की कुटी थी। इसे महाभारत और पुराणों के पवित्र स्थलों की सूची में भी शामिल किया गया था। इस किले का नामकरण शिव के विनाशकारी रूप काल से हुआ जो सभी चीजों का जर अर्थात पतन करते हैं। काल और जर को मिलाकर कालिंजर बना। इतिहासकारों का मत है कि यह किला ईसा पूर्व का है। महमूद गजनवी के हमले के पश्चात इतिहासकारों का ध्‍यान इस किले की तरफ गया। 108 फुट ऊंचे इस किले में प्रवेश के लिए अलग-अलग शैलियों के सात दरवाजों को पार करना होता है। इसके अंदर  हैरान कर देने वाली पत्थर की गुफाएं हैं। चोटी पर भारत के इतिहास की याद दिलाती हिन्दू और मुस्लिम शैली की इमारतें हैं। कहा जाता है कि कालिंजर के भूमितल से पतालगंगा नामक नदी बहती है जो इसकी गुफाओं को जीवंत बनाती है। बहुत से बेशकीमती पत्थर यहां बिखर हैं।
खजुराहो से 80 किलोमीटर दूर अजयगढ़ का दुर्ग है। यह दुर्ग चन्देल शासन के अर्द्धकाल में बहुत ही महत्वपूर्ण था। विन्ध्य की पहाड़ियों की चोटी पर यह किला स्थित है। किले में दो प्रवेश द्वार हैं। किले के उत्तर में एक दरवाजा और दक्षिण-पूर्व में तरहौनी द्वार भी है। दरवाजों तक पहुंचने के लिए चट्टान पर 45 मिनट की खड़ी चढ़ाई चढ़नी होती है। किले के बीचों बीच अजय पलका तालाव नामक झील है। झील के आखिर में जैन मंदिरों के अवशेष बिखर हैं। झील के किनारे कुछ प्राचीन काल के स्थापित मंदिरों को भी देखा जा सकता है। किले की प्रमुख विशेषता ऐसे तीन मंदिर हैं जिन्हें अंकगणितीय विधि से सजाया गया है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने कुछ समय पहले ही इस किले की देखभाल का जिम्मा उठाया है।

खरीददारी
खजुराहो में अनेक छोटी-छोटी दुकानें हैं जो लोहे, तांबे और पत्थर के गहने बेचते हैं। यहां विशेष रूप से पत्थरों और धातुओं पर उकेरी गई कामसूत्र की भंगिमाएं प्रसिद्ध हैं। इन्हें यहां की दुकानों से खरीदा जा सकता है। मृगनयनी सरकारी एम्पोरियम के शटर ज्यादातर गिरे रहते हैं। दिसम्बर में राज्य के ट्राईबल और फॉक संग्रहालय में कारीगरों की एक कार्यशाला आयोजित की जाती है। कार्यशाला से यहां के कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। उनकी अद्भुत कला के नमूनों को यहां से खरीदा जा सकता है।

आवागमन
खजुराहो जाने के लिए अपनी सुविधा के मुताबिक वायु, रेल या सड़क परिवहन को अपनाया जा सकता है।

वायु मार्ग
खजुराहो वायु मार्ग द्वारा दिल्ली, वाराणसी, आगरा और काठमांडु से जुड़ा हैं। खजुराहो एयरपोर्ट सिटी सेन्टर से तीन किलोमीटर दूर स्थित है।

रेल मार्ग
खजुराहो रेलवे स्टेशन से दिल्ली और वाराणसी के लिए रेल सेवा है। दिल्ली और मुम्बई से आने वाले पर्यटकों के लिए झांसी भी सुविधाजनक रेलवे स्टेशन है। जबकि चेन्नई और वाराणसी से आने वालों के लिए सतना ज्यादा  सुविधाजनक होगा। नजदीक और सुविधाजनक रेलवे स्टेशन से टैक्सी या बस के माध्यम से खजुराहो पहुंचा जा सकता है। सड़कों की स्थिति ठीक है।

सड़क मार्ग
खजुराहो महोबा, हरपालपुर, छतरपुर, सतना, पन्ना, झांसी, आगरा, ग्वालियर, सागर, जबलपुर, इंदौर, भोपाल, वाराणसी और इलाहाबाद से नियमित और सीधा जुड़ा है। दिल्ली के राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से पलवल, कौसी कला और मथुरा होते हुए आगरा पहुंचा जा सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 3 से धौलपुर और मुरैना के रास्ते ग्वालियर जाया जा सकता है। उसके पश्चात राष्ट्रीय राजमार्ग 75 से झांसी, मउरानीपुर और छतरपुर से होते हुए बमीठा और वहां से राज्य राजमार्ग की सड़क से खजुराहो पहुंचा जा सकता है।


Binoculars/Information