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राई-सरसों क्षेत्र में अनुसन्धान

निसंदेह! देश की लगभग 60 % से अधिक आबादी के लिए कृषि (Agriculture -अर्थात Ager = Field + culture = Cultivation यानि field Cultivation) जीविकोपार्जन का मुख्य साधन है, जो गैर कृषि क्षेत्र तथा औद्योगिक क्षेत्र के लिए कच्ची सामग्री मुहैया कराती है उल्लेखनीय है कि देश की देश की लगभग 72% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जो पूर्णरूपेण खेती पर निर्भर है वर्ष 2013-14 के दौरान, देश में अब तक का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन 265.57 मिली.टन हुआ था, लेकिन वर्ष 2014-15 में देश के अधिकांश राज्यों - महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड आदि में रबी फसल कटाई से पूर्व वर्षा के कारण खाद्यान्न उत्पादन अर्थात 252.68 मिलियन टन लगभग 1.5% की गिरावट के साथ हुआ चूकिँ 'किसान को अन्नदाता' कहा जाता है अर्थात किसान की सेवा, ईश्वर की सेवा है इसलिए किसानों के सामने आने वाली समस्याओं, जैसे-असामयिक वर्षा, ओला, सूखा, पाला पड़ना, सिंचाई जल की उन्नत पद्धतियों एवं संसाधनों की सुविधा का न होना, उर्वरक, उन्नत बीजों की समय पर उपलब्धता न हों, आदि का निदान करना होगा देश की कुल जीडीपी में कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्र की हिस्सेदारी वर्ष 2007-08 में 16.8% से घटकर वर्ष 2013-14 में 13.94% रह गई है, जो चिंता का विषय बनता जा रहा है साथ ही, कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्र की कुल जीडीपी में वृद्धि दर इन वर्षों में 5.8% (2007-08) से घटकर 1.1% (2014-15) ही रह गई है, जबकि जनसंख्या (जनगणना-2011 में 121 करोड़) @ 1.78% वार्षिक वृद्धि दर के साथ,अब 125 करोड़ को पार कर गई है जिसके लिए 21 वीं सदी में रोटी, कपड़ा और मकान की निरन्तर/सतत वृद्धि मांग को पूरा करना एक चुनोती होगी, जिस हेतु कृषि में खाद्यान्न (तिलहन, दलहन, धान्य) उत्पादन को और बढ़ाने हेतु ध्यान देना होगा

इस संदर्भ में भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद (ICAR) के अधीनस्थ राई-सरसों अनुसन्धान निदेशालय (DRMR), भरतपुर (राज.) का लक्ष्य राई-सरसों हेतु यह रखा गया है –

राई-सरसों अनुसन्धान निदेशालय की वार्षिक रिपोर्ट 2014 -15 के अनुसार, राई-सरसों के क्षेत्र में 'अनुसन्धान एवं विकास' में अनेक उपलब्धियां हासिल हुई है, जिन्हें निम्नवत संक्षिप्त में वर्णित किया जा सकता है-

प्रमुख उपलब्धियां एवं नई दिशाएं

राई-सरसों अनुसन्धान निदेशालय का संगठनात्मक ढांचा/संरचना एवं क्रियाकलाप (Organizational Set -up /Infrastructure and  functional Activities of Directorate of Rapeseed -Mustard Research -DRMR -ICAR -Indian Council of Agricultural Research)- Hq. सेवर, भरतपुर (राजस्थान)-w.e.f 1993 (स्थापना वर्ष)

 

Directorate of Rapeseed -Mustard Research -ICAR ने वर्ष 2013 में 'गौरवशाली 20 वर्ष' (w.e.f.1993 -2013) अर्थात '20 Years of Glory' मनाया जिसका मुख्य उद्देश्य/मिशन ''सरसों की अभिवृद्धि : किसानों की समृद्धि'' है, तभी देश में वर्ष 2025 तक राई-सरसों उत्पादन को दोगुना कर 'दूसरी पीली क्रांति' (Second Yellow Revolution) को प्राप्त कर सकेंगे

 

देश में DRMR द्वारा राई-सरसों अनुसन्धान एवं विकास क्षेत्र में फैलाव - DRMR, भरतपुर (राजस्थान) द्वारा अनुसन्धान एवं विकास तथा फार्म-प्रदर्शन के क्षेत्र में राई-सरसों के उत्पादन को बढ़ाने हेतु पूरे देश में 5 जॉन में फैलाव है, जैसे-जॉन 1 (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश); जॉन 2 (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान का जुड़ा हिस्सा); जॉन 3 (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान); जॉन 4 (राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र) तथा जॉन 5 छतीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, प.बंगाल, ओडिशा, अफीम एवं - NE Hill state) में

 

DRMR, भरतपुर (राजस्थान) द्वारा 'गौरवशाली 20 वर्ष' (Celebrating 20 Years of Glory 1993 -2013) 20 अक्टूबर, 2013 में -स्थापना वर्ष 1993, उत्सव मनाया गया, जिसके मुख्य अतिथि डॉ. आर.एस.परोदा, पूर्व डी.जी. (ICAR) रहे थे, साथ ही, डॉ. बी.बी सिंह सहायक महानिदेशक (ADG -तिलहन एवं दलहन, ICAR नई दिल्ली), कृषि वैज्ञानिक एवं अनेक कृषक मौजूद थे कृषकों को पुरस्कार भी दिए गए

 

राई-सरसों उत्पादन बढ़ाने हेतु (भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद) द्वारा प्रोत्साहन/लक्ष्य

राई-सरसों एवं कुल तिलहन उत्पादन में देश के प्रथम तीन राज्य (वर्ष 2013 -14)

(उत्पादन-मिलियन तन एवं % में)

मद/राज्य                राई-सरसों                                  कुल 9 तिलहनें

प्रथम                    राजस्थान-3.86 (48.1)                गुजरात-6.8 (20 .8)

द्वितीय                  मध्य प्रदेश-0.99 (11.3)               मध्य प्रदेश-6 .7 (20.3)

तृतीय                   हरियाणा-0.93 (11.1)                राजस्थान-6.1 (18.5)

9 तिलहनें-मूंगफली, राई-सरसों, तिल, अलसी, अंडी, नाइगरबीज, कुसुम, सूरजमुखी एवं सोयाबीन (आर्थिक समीक्षा 2014 -15)

 

 खाद्य तेल उपभोग हेतु प्रति व्यक्ति उपलब्धता

(खाद्य तेल की प्रति व्यक्ति उपलब्ध मात्रा) किग्रा में)

वर्ष/मद                     खाद्य तेल उपलब्धता

1955-56                      2.5 

2001-02                      8.8 

2010-11                      13.0 

2011-12                      13.8 

2012-13                      15.8 

2013-14                      16.8 

 

उपर्युक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि विगत (लगभग) 6 दशकों में खाद्य तेल के उपभोग में प्रतिव्यक्ति उपलब्धता में 6 गुनी वृद्धि हुई है, जिसे 21 वीं सदी में और बढ़ाना होगा, क्योकिं देश की बढ़ती निरंतर/सतत जनसंख्या वृद्धि की खाद्य तेल आवश्यकताओं को पूरा करना होगा

 राई-सरसों अनुसन्धान निदेशालय की वार्षिक रिपोर्ट 2014 -15 के अनुसार, राई-सरसों के क्षेत्र में 'अनुसन्धान एवं विकास' में अनेक उपलब्धियां हासिल हुई है, जिन्हें निम्नवत संक्षिप्त में वर्णित किया जा सकता है-

दीर्घकालीन उर्वरता परीक्षण के परिणाम (Results of Long -term fertility Experiment)- चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसा (हरियाणा) में जिक़, गन्धक एवं गोबर की खाद (FYM) तथा GBPUAT, पंतनगर (उत्तराखंड) में FYM को 100% अनुमोदित खाद के अतिरिक्त डालने से सरसों में ज्यादा पैदावार प्राप्त हुई

 राई-सरसों में सूखा प्रबन्धन परीक्षण (Drought Management Testing in Rapeseed -Mustard)- राई-सरसों में 50% फूल एवं 50% फलियाँ भरने की फसल अवस्था में कृषि रसायनों के छिड़काव से 1 से 45%; थायोयूरिया से 55% तथा KNO3 के स्प्रे से 63% (लगभग) तक उत्पादन में वृद्धि अंकित की गयी है राई-सरसों, आलू, अरहर में तनु गन्धक के अम्ल (Dilute H2SO4) के 0.1% घोल @ 1ml/लीटर पानी प्रति एकड़ के छिड़काव से पाले (frost) का बुरा प्रभाव नही पड़ता है

 'परती-सरसों-सूरजमुखी' (200% शस्य गहनता) लगातार फसल चक्र अपनाने से सरसों की उपज घट जाती है, अतः खरीफ में ढ़ेंचा/सनई की हरी खाद अथवा मूंग की फसल ली जाएं, तो भूमि में जीवांश पदार्थ (O.C) की मात्रा 0.85% (सर्वोत्तम) से घटकर 0.2% से कम रह गई है

 खरपतवार प्रबन्धन-राई-सरसों में बथुआ, दूबघास, कृष्णनील, मोथा, ओरोबंकी, हिरनखुरी, प्याजी, गाजरघास, गेहूं का मामा आदि काफी उग आते है अतः इनके नियंत्रण हेतु (at-30 DAS); क्लोडिनोफोप 15 WP @ 0.06 किग्रा /हेक्टेयर (25-30 दिनों के अंतर पर); ऑक्सीडायरजिल (Oxidiargyl) Post Emergence @ 0.09 किग्रा/हेक्टेयर आदि के प्रयोग से इन खरपतवारों के नियंत्रण में अच्छी सफलता मिली है चूँकि खरपतवार प्रायः 9-63% तक राई-सरसों की उपज में कमी कर देतें है ओरोबंकी खरपतवार (जड़ परजीवी) को 5 -6 बून्द सोयाबीन तेल/पौधा डालने से नियंत्रण हो जाता है

 सरसों की नई उन्नत प्रजातियां - बायो-902 (पूसा जय किसान), पूरा बोल्ड, जगन्नाथ (VLS-5), वसुंधरा (RH-9802), स्वर्ण ज्योति (RH -9802), आशीर्वाद (RK-01-03), अरावली (RN-393), NRCYS-05-2 (पीली सरसों), भारत सरसों 1, 2 व 3 आदि प्रजातियों की अच्छी पैदावार है.

 निष्कर्ष

 इस विवरण से स्पष्ट है कि वर्ष 2014 -15 के दौरान, राई-सरसों अनुसन्धान निदेशालय द्वारा राई-सरसों सम्बन्धी अनुसन्धान एवं विकास प्रोग्राम्स/स्कीम, नई दिशाएं, प्रचार -प्रसार सम्बन्धी अनेक गतिविधियां एवं उपलब्धियां हासिल हुई, जिनसे निम्लिखित निष्कर्ष निकाला जा सकता है-

 (1) राई-सरसों में, सूखा प्रबन्धन के क्षेत्र में, फसल में 50% फूल + 50% फलियाँ भरने कि अवस्था में थायोयूरिया (Thiourea @ 0.05%) के द्वारा 56%; यूरिया (1%) @ 45% स्प्रे से 45% तथा KNO3 (1%) के स्प्रे से 63% उपज में वृद्धि मिली है, जो एक सफलता की कहानी है

 (2) राई-सरसों में, खरपतवारों के द्वारा प्रायः 9-63 % उपज में हानि होती है, अतः आइसोप्रोट्यूरॉन (75 WP) @ 1 किग्रा a.i /हेक्टेयर ; पेंडीमिथिलीन (30 EC) @ 1 किग्रा/हेक्टेयर दोनों का ही प्रयोग अंकुरण से पूर्व (PE -Pre -Emergence); तथा क्लोडिनाफाप (ISWP ) @ 0.06 किग्रा/हेक्टेयर फसल की 25 -30 दिन अवस्था पर ( DAS) के उपयोग से अच्छे परिणाम मिले है

 (3) करन राई (Brassica carinata) की DRMR -270 तथा DRMR-261 प्रजातियों में सफेद-गेरुई रोग (White Rust Disease) के लिए प्रतिरोधी सिद्ध हुई है

 (4) समेकित रोग प्रबन्धन (Integrated Disease Management) में भूमि में जिंक सल्फेट @ 15 किग्रा/हेक्टेयर तथा संस्तुत मात्रा में सल्फर के उपयोग से विभिन्न रोगों पर प्रभावी नियंत्रण अनुसंधानों से देखा गया है, इससे उपज में अच्छी वृद्धि हुई है साथ ही, सरसों की पत्तियां पीली पड़ने 2 किग्रा जिंक सल्फेट (0.5% का घोल -21 % Zn वाला) + 0.25% चूने का पानी @ 1 किग्रा/हेक्टेयर + 2% यूरिया अर्थात 8 -10 किग्रा/एकड़, 400-500 लीटर पानी/हेक्टेयर स्प्रे से लाभ मिलता है साथ ही फसल पर सर्दियों में (दिसम्बर अंत से जनवरी तक) पाले (forst) का असर नही होता है.


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