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जल अधिनियम,1974

यह अधिनियम जल प्रदूषण की सुरक्षा और नियंत्रण और अनुरक्षण या जल की गुणवत्ता की पुनर्प्राप्ति के लिए है इसके लिए केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद क्रमशः 3 और 4 के अंतर्गत स्थापित किये गए है इस अधिनियम में कुछ संदेहों के स्पष्टीकरण और अधिक अधिकारों  को सन्निहित करने के स्पष्टीकरण और प्रदूषण बोर्ड में और अधिक अधिकारों को सन्निहित करने के उद्देश्य से सन 1978 और 1988 में संशोधन किये गए.


वन (संरक्षण) अधिनियम, 1981 

सन 1980 में जारी और 1981 में क्रियान्वयन के बाद सन 1988 में इस अधिनियम को संशोधित किया गया. इस अधिनियम के अंतर्गत किसी आरक्षित वन को अनारक्षित करने, वन के लिए निर्धारित भूमि को अन्य वन विहीन कार्यों के लिए उपयोग करने, वन के लिए चिन्हित भूमि को किसी निजी व्यक्ति या पंचायत (कॉर्पोरेशन) को सौंपने, किसी वनभूमि को पुनः वनीकरण हेतु साफ करने की स्थितियों में राज्य सरकार को केंद्र सरकार से पूर्व 'अनुमति' लेने के लिए बाध्य करता है. राज्य के निवेदन के उपरांत इन्हें देखने के लिए बनी परामर्श समिति की सिफारिश के बाद ही स्वीकृति या अस्वीकृति प्रदान की जाती है. परिवर्तन की स्वीकृति मिल जाने पर उसी क्षेत्र की वनविहीन भूमि में उसके बदले में वनरोपण करना भी अन्य शर्तों के साथ निर्देशित किया जाता है वनविहीन क्षेत्र की अनुपलब्धता की स्थिति में 'क्षरित वन भूमि' पर वनरोपण किया जाना चाहिए और यह परिवर्तन किये गए क्षेत्र की तुलना में दोगुना अधिक होनी चाहिए.
 

साइट्स (सीआईटीएस)

वन्य प्राणियों एवं पेड़ पौधों की संकटग्रस्त जातियों की अंतराष्ट्रीय व्यापार उपसंधि (सीआईटीएस) 1975 से लागू हुई, इसका उद्देश्य वन्य प्राणियों और पेड़-पौधों के अंतराष्ट्रीय व्यापार को रोकना है भारत ने इस उपसंधि पर हस्ताक्षर किये है-

वन्य प्राणी और पेड़-पौधें अपने प्राकृतिक तंत्रों का एक अद्वितीय भाग है

 

वे सौन्दर्यात्मक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, मनोरंजन व आर्थिक दृष्टिकोण से वन्य प्राणियों और पेड़-पौधों के बढ़ते हुए मूल्य के प्रति जागरूक है

 

लोग और राष्ट्र अपने वन्य प्राणियों और पेड़-पौधों के सबसे अच्छे रक्षक है और होने चाहिए

 

अंतराष्ट्रीय व्यापार द्वारा अतिशोषण के विरुद्ध वन्य प्राणियों और पेड़-पौधों की कुछ जातियों की सुरक्षा के लिए अंतराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है

 

इस उद्देश्य के लिए उचित कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है साइट्स वन्य जीव-संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योकिं यह अंतराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग प्रदान करता है जिसके बिना अवैध व्यापार को नियंत्रित नही किया जा सकता

 

अंतराष्ट्रीय जैवविविधता संरक्षण कानून

जैवविविधता के संरक्षण के लिए पहली बार जून 1992 में रियो डे जेनेरो में एक अंतराष्ट्रीय संधि हुई 29 जून, 1993 को यह संधि लागू कर दी गयी इसके तहत जैवविविधता के संरक्षण के लिए पहली बार एक अंतराष्ट्रीय कानून बना जून 2001 में यूरोपीय संघ के एक सम्मेलन में '2010 जैव विविधता लक्ष्य' तय किये गए.

 

वायु (सुरक्षा एवं प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1981 

यह अधिनियम देश में वायु की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए वायु प्रदूषण से रक्षा, नियंत्रण और उपशमन के लिए निर्मित किया गया है. इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं नीचे वर्णित है-
1. यह अधिनियम सम्पूर्ण भारत में प्रभावी है.
2. अधिनियम के सेक्शन 19 के अंतर्गत राज्य सरकार के राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के साथ परामर्श कर वायु प्रदूषण नियंत्रित क्षेत्र घोषित करने का अधिकार है जिसमें अधिनियम के विधान प्रभावी होंगे
3. सेक्शन 21 (1) व (2) के प्रावधानों के अनुसार कोई भी व्यक्ति राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद की पूर्व अनुमति के बिना औद्योगिक संयंत्र की स्थापना या संचालन नही कर सकता है
4. सेक्शन 22 एवं 22 (1) के अंतर्गत किसी औद्योगिक संयंत्र का संचालन जो राज्य परिषद द्वारा निर्धारित मानक से अधिक वायु प्रदूषण उत्सर्जित करता है, वह परिषद द्वारा निर्धारित अभियोग के लिए जिम्मेदार होगा
 
राज्य परिषद के अधिकार
राज्य परिषद को वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र के रूप में किसी क्षेत्र की घोषणा या प्रतिबन्ध के लिए परामर्श देने के साथ ही निम्नलिखित अधिकार प्रदान किये गए है-
1. प्रवेश और निरीक्षण का अधिकार- राज्य परिषद के किसी भी अधिकृत व्यक्ति को औद्योगिक परिसर में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण की स्थिति का निरीक्षण करने का अधिकार है
 
2. नमूना प्राप्त करने का अधिकार- राज्य परिषद या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को वायु या किसी चिमनी में रोशनदान या निकास नली या कोई अन्य निकास से उत्सर्जन का नमूना लेने का अधिकार है

3. निर्देश देने का अधिकार - राज्य परिषद किसी भी व्यक्ति/प्राधिकारी को कोई भी उद्योग बंद, प्रतिबन्धित या उनका नियमन करने के निर्देश देने के अधिकार देता है.


पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1896 

केंद्रीय सरकार के अधिकारियों को विश्लेषण करने के लिए किसी भी स्थान से वायु, जल, मिट्टी या कोई अन्य पदार्थ का नमूना लेने का अधिकार है. इस अधिनियम को 23 मार्च, 1986  को भारत के राष्ट्रपति द्वारा मान्यता प्रदान की गई यह अधिनियम पर्यावरण की सुरक्षा, उसकी उन्नति और सम्बन्धित मामलों के लिए बनाया गया है इसे भोपाल गैस दुर्घटना के बाद संविधान का अधिनियम 263 के अंतर्गत सम्मिलित कर दिया गया है, इस अधिनियम के सेक्शन 3 (1) ने भारत सरकार को अधिकृत किया है कि ''पर्यावरण गुणवत्ताकि सुरक्षा एवं उन्नयन तथा प्रदूषण से रक्षा, नियंत्रण एवं उपशमन के लिए समस्त सम्भव उपायों को करें, जो इनके लिए आवश्यक या उचित प्रतीत हो'' इस अधिनियम द्वारा केंद्र सरकार को पर्यावरणीय गुणवत्ता के अनुरक्षण हेतु नए राष्ट्रीय मानकों के निर्धारण और उत्सर्जन तथा बहिस्राव विसर्जन को भी नियंत्रित करने के लिए मानकों, खतरनाक अपशिष्टों और रसायनों के प्रबन्धन के लिए विधियों का निर्धारण करने, उद्योगों के स्थान का नियमन करने, दुर्घटना रोकने के लिए सुरक्षा प्रबन्धों की स्थापना  करने, पर्यावरणीय प्रदूषण सम्बन्धी सूचनाओं का संग्रह एवं वितरण करने का अधिकार दिया गया है यह अधिनियम केंद्रीय सरकार के अधिकारियों को नियमित रूप से लिखित आदेश जारी करने, किसी उद्योग को बंद, प्रतिबंधित या नियमित करने का संचालन या तरीकों को रोकने, बिजली और पानी की आपूर्ति या किसी भी अन्य सेवाओं को बंद करने के लिए अधिकृत करता है.
इस अधिनियम के अनुसार निर्धारित मानक से अधिक प्रदूषकों को विसर्जित करने वाला व्यक्ति इसकी सुरक्षा या प्रदूषणों को घटाने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है और सरकारी प्राधिकरण को विसर्जन की सूचनाएं देने के लिए बाध्य है. इस अधिनियम को दोषी व्यक्तियों को पांच वर्षों तक का कारावास या 1  लाख रूपये तक का जुर्माना या दोनों से दण्डित करने का अधिकार है. इसे मानने से इंकार करने पर 5 हजार रूपए प्रतिदिन की दर से अतिरिक्त जुर्माना लगाकर दण्डित करने का भी प्रावधन है


Binoculars/Information