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अकबर के नवरत्नों में से एक सुप्रसिद्ध

भारतीय संगीत के सुप्रसिद्ध गायक तानसेन का जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक एक सिद्ध फ़क़ीर की दुआ से ग्वालियर से सात मील दूर स्थित एक छोटे-से गाँव बेहट में संवत 1563 में ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता मकरंद पांडे, पांडित्य और संगीत-विद्या में लोकप्रिय होने के साथ ही धन-धान्य से यथेष्ट रूप से पूर्ण थे। इनकी माता पूर्ण साध्वी व कर्मनिष्ठ महिला थी। तानसेन का लालन-पालन बहुत लाड़-प्यार से हुआ। एक संतान होने के कारण इनके माता-पिता ने किसी तरह का कोई कठोर नियंत्रण नहीं रखा।

तानसेन मूल नाम
तानसेन का मूल नाम क्या था, यह कहना बहुत कठिन है, कहा जाता है कि उन्हें तन्ना, त्रिलोचन, तनसुख या फिर रामतनु बुलाया जाता था। तानसेन इनका नाम नही उपाधि थी, ये उपाधि बांधवगढ़ के राजा रामचंद्र से मिली थी। यह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि उसने इनके मूल नाम  लुप्त ही कर दिया। हिन्दी साहित्य में इनके जन्म की संवत 1588 प्रसिद्ध है

तानसेन की संगीत शिक्षा
तानसेन दस वर्ष की आयु तक पूरी तरह से स्वतंत्र, नटखट प्रकृति के हो गए। इस बीच इनके अन्दर एक आश्चर्यजनक प्रतिभा देखी गई, वह थी आवाज़ों की हू-ब-हू नक़ल करना। किसी भी पशु-पक्षी की आवाज़ की नक़ल करना इनका खेल था। शेर की बोली बोलकर अपने बाग़ की रखवाली करने में इन्हें बड़ा आनंद आता था।
एक दिन वृन्दावन के महान संगीतकार, स्वामी हरिदास जी अपनी शिष्य-मंडली के साथ उस बाग़ से होकर गुज़रे, तो बालक "तन्ना" ने एक पेड़ की आड़ में छिपकर शेर जैसी दहाड़ लगाई। डर के मारे सब लोगों के दम फूल गये स्वामी जी को उस स्थान पर शेर का विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने खोज की। उन्हें दहाड़ता हुआ बच्चा मिल गया। बालक के इस काम से स्वामी जी बहुत खुश हुए। उन्होंने जब अन्य पशु-पक्षियों की आवाज़ भी बालक से सुनी, तो वो मुग्ध हो गए और उसके पिता से बालक को संगीत-शिक्षा देने के लिए माँगकर अपने साथ वृदावन ले गए। गुरुकृपा से 10 साल में ही बालक तन्ना अच्छा गायक बन गया और यहीं उसका नाम 'तन्ना' के स्थान पर "तानसेन" हो गया। गुरु का आशीर्वाद पाकर तानसेन ग्वालियर लौट आए। उसी समय उनके पिता की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पहले पिता ने तानसेन से कहा कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक फ़क़ीर की कृपा से हुआ है इसलिए तुम्हारे शरीर पर पूर्ण अधिकार उस फ़क़ीर का है। तुम अपनी ज़िन्दगी में उस फ़क़ीर की आज्ञा की कभी अवहेलना नही करना। पिता का आदेश मानकर तानसेन फक़ीर मुहम्मद ग़ौस के पास आये। फक़ीर ने तानसेन को अपना उत्तराधिकारी मानकर अपना अतुल वैभव सब कुछ तानसेन को सौंप दिया और तानसेन ग्वालियर में ही रहने लगे।

तानसेन की शादी 
राजा मानसिंह की विधवा पत्नी रानी मृगनयनी तानसेन की मित्र थी रानी मृगनयनी खुद बड़ी मधुर तथा विदुषी गायिका थी। वो तानसेन का गायन सुनकर बहुत प्रभावित थी। उन्होंने अपने संगीत-मंदिर में शिक्षा प्राप्त करनेवाली हुसैनी ब्राह्मणी नाम की एक सुमधुर गायिका युवती के साथ तानसेन का विवाह करा दिया। हुसैनी का वास्तविक नाम प्रेमकुमारी था। हुसैनी के पिता सारस्वत ब्राह्मण थे, किंतु बाद में ये सपरिवार मुस्लिम धर्म में दीक्षित हो गए। प्रेमकुमारी का इस्लामी नाम हुसैनी था। ब्राह्मणी कन्या होने की वजह से सब उसे हुसैनी ब्राह्मणी कहते थे, इसी कारण तानसेन का घराना 'हुसैनी घराना' कहा जाने लगा।
शादी के बाद तानसेन फिर से अपने गुरु जी के आश्रम (वृन्दावन) में शिक्षा प्राप्त करने चले गए। उसी समय फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस का अंतिम समय करीब आ गया। गुरु के आदेश पर तानसेन को ग्वालियर वापस आना पड़ा। फक़ीर की मृत्यु हो गई लेकिन वो तानसेन को विशाल संपत्ति के अधिकारी बना गए। तानसेन, ग्वालियर में रहकर सुखपूर्वक गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने लगे। तानसेन के चार बेटे और एक बेटी थी। उनके बेटों के नाम- सुरतसेन, तरंगसेन, शरतसेन, और विलास ख़ाँ और बेटी का नाम सरस्वती रखा गया। तानसेन के सभी बच्चे संगीत-कला के संस्कार लेकर पैदा हुए। सभी बच्चे श्रेष्ठ, उत्कृष्ट कलाकार हुए।
संगीत-साधना पूर्ण होने के पश्चात सबसे पहले तानसेन को रीवा, नरेश रामचन्द्र अपने दरबार में ले गए। उसी समय तानसेन का भाग्य-सूर्य चमक उठा। नरेश रामचंद्र ने तानसेन जैसे दुर्लभ रत्न को बादशाह अकबर को भेंट कर दिया। 1556 में, तानसेन अकबर के दरबार दिल्ली गए। बादशाह ऐसा अमूल्य रत्न पाकर बहुत खुश हुए और तानसेन को उसने अपने नवरत्नों में शामिल कर लिया।

तानसेन की रचनाएँ
तानसेन मौलिक कलाकार थे। वो स्वर-ताल में गीतों की रचना भी किया करते थे। तानसेन के तीन ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है-

    'संगीतसार',
    'रागमाला' और
    'श्रीगणेश स्तोत्र'।

दीपक राग
यह तानसेन का शौर्यकाल हुआ करता था। बादशाह अकबर, तानसेन से अटूट स्नेह और उनका बहुत सम्मान करते थे। अकबर तानसेन के संगीत का जैसे ग़ुलाम ही बन गया था। कला-पारखी अकबर तानसेन की संगीत-माधुरी में डूब गया। अकबर पर तानसेन का ऐसा पक्का रंग सवार देखकर दूसरे दरबारी गायक उससे जलने लगे और एक दिन उन्होंने तानसेन के नाश की योजना बनाई। ये सब लोग बादशाह के पास पहुँचकर कहने लगे- "हुज़ूर, हमें तानसेन से 'दीपक' राग सुनना  है और आप भी सुनें। इसको तानसेन के अलावा और कोई व्यक्ति अच्छे से नहीं गा सकता।" बादशाह तैयार हो गए। तानसेन द्वारा इस राग का अनिष्टकारक परिणाम बताए जाने और लाख समझाने पर भी अकबर का राजहट नहीं टला और उसे दीपक राग गाना ही पड़ा। राग जैसे ही आरम्भ हुआ, गर्मी बढ़ने लगी व धीरे-धीरे वायुमंडल अग्निमय हो गया। सुनने वाले अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर छिप गए, लेकिन तानसेन का शरीर अग्नि की ज्वाला से जल उठा। उसी समय तानसेन अपने घर गए। वहाँ उनकी पुत्री ने मेघ राग गाकर उनके जीवन की रक्षा की। इस घटना के कई महीने बाद तानसेन का शरीर स्वस्थ हुआ। बादशाह अकबर को भी अपनी ग़लती पर बहुत पछतावा हुआ। 

तानसेन की मृत्यु
तानसेन दिल्ली में ही ज्वर से पीड़ित हुए। तानसेन ने अपना आखिरी समय जानकर ग्वालियर जाने की इच्छा जताई, लेकिन बादशाह के मोह और स्नेह की वजह से तानसेन फ़रवरी, 1585 में, दिल्ली में ही स्वर्गवासी हो गए। उनकी इच्छानुसार तानसेन की पार्थिव देह ग्वालियर पहुंची और मुहम्मद ग़ौस की क़ब्र के पास उनकी समाधि बना दी गई। तानसेन की मृत्यु के बाद उनके छोटे बेटे विलास ख़ाँ ने तानसेन के संगीत को जीवित रखने व उनकी कीर्ति को प्रसारित करने का जिम्मा उठाया और समर्थ भी हुआ। भारतीय संगीत के इतिहास में ध्रुपदकार के रूप में तानसेन का नाम सदा अमर रहेगा।    


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