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गुलाबी शहर को बसानेवाले राजा

सवाई जयसिंह, द्वितीय अठारहवीं सदी में भारत में राजस्थान प्रान्त के राज्य आमेर के सबसे ज्यादा प्रतापी शासक हुआ करते थे। जयसिंह द्वितीय 4 नवम्बर, 1688 में आमेर में पैदा हुए थे इनके पिता का नाम राजा विष्णुसिंह और माता का नाम इन्द्रकँवर था राजा जयसिंह ने 1727 में, आमेर से दक्षिण छः मील दूर एक बहुत ही सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविधापूर्ण तथा शिल्पशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर नया नगर 'सवाई जयनगर', जयपुर बसाने वाले नगर नियोजक के तौर पर उनकी ख्याति भारत के इतिहास में आज भी अमर है। सवाई राजा जयसिंह आमेर का वीर और बहुत कूटनीतिज्ञ शासक हुआ करता था। वो 'जयसिंह द्वितीय' के नाम से भी प्रसिद्ध थे। मुगल शासक औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य में बहुत अव्यवस्था व्याप्त हो गयी थी। उसी वक्त राजा जयसिंह ने अपना विद्रोह का झंडा बुलन्द कर दिया था। उन्होंने बहादुरशाह प्रथम के खिलाफ विद्रोह किया था लेकिन उनके विद्रोह को दबा दिया गया और बादशाह ने राजा जयसिंह को माफ़ भी कर दिया था। सवाई राजा जयसिंह ने 44 सालों तक आमेर का राजसिंहासन संभाला। कुछ समय पश्चात  वह मालवा में, और फिर आगरा में बादशाह का प्रतिनिधि नियुक्त किये गए। पेशवा बाजीराव प्रथम के साथ उसके सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण और बहुत अच्छे थे। मुगल साम्राज्य के खण्डहरों पर 'हिन्दू पद पादशाही' की स्थापना करने के पेशवा के लक्ष्य से उसे बहुत सहानुभूति थी। इसके साथ ही 
सवाई राजा जयसिंह, संस्कृत और फ़ारसी भाषा के विद्वान होने के साथ ही गणित और खगोलशास्त्र के असाधारण पण्डित थे। उन्होंने 1725 में, नक्षत्रों की शुद्ध सारणी का निर्माण किया और उस सारणी का नाम तत्कालीन मुगल सम्राट के नाम पर जीजमुहम्मदशाही रखा। उन्होंने 'जयसिंह कारिका’ नाम के ज्योतिष ग्रंथ की रचना भी की थी। सवाई राजा जयसिंह की महान देन जयपुर शहर है, जिसकी स्थापना उन्होंने 1727 में की थी। जयपुर शहर के वास्तुकार का नाम विद्याधर भट्टाचार्य था। नगर निर्माण की दृष्टि से यह भारत तथा पूरे यूरोप में अपने ढंग का अनूठा शहर है, जिसकी उस समय के और वर्तमानकालीन विदेशी यात्रियों ने मुक्तकंठ से बहुत तारीफ की है। जयपुर में राजा जयसिंह ने सुदर्शनगढ़ यानि नाहरगढ़ के क़िले का निर्माण करवाया और साथ ही जयगढ़ क़िले में जयबाण नाम की तोप बनवाई थी। राजा जयसिंह ने  दिल्ली, जयपुर, मथुरा, बनारस और उज्जैन में पांच वैधशालाओं यानि जन्तर-मन्तर का निर्माण कराया और साथ ही ग्रह और नक्षत्र आदि की गति को सही तरीके से जानने के लिए कराया था। जयपुर के जन्तर-मन्तर में सवाई राजा जयसिंह द्वारा निर्मित सूर्य घड़ी आज भी है, जिसे सम्राट यंत्र के नाम से भी जाना जाता है, जो दुनिया की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी के रूप में प्रसिद्ध है। धर्मरक्षक होने के कारण सवाई राजा जयसिंह ने वाजपेय, राजसूय आदि यज्ञों का आयोजन भी किया था। वो अंतिम हिन्दू शासक थे, जिन्होंने भारतीय परम्परा के अनुकूल अश्वमेध यज्ञ भी कराया था। इस तरह से सवाई राजा जयसिंह ने अपने शौर्य, बल, कूटनीति और विद्वता की वजह से उस समय के ख्याति प्राप्त व्यक्ति बन गए थे, फिर भी राजा जयसिंह उस युग के प्रचलित दोषों से ऊपर न उठ सके। 
कहा जाता है कि राजा जयसिंह अन्तिम समय में गोविन्ददेव के ध्यान में लीन रहते थे, सवाई जयसिंह की मृत्यु जयपुर में सितम्बर 21, 1743 में, वृद्धावस्था और बीमार रहने के पश्चात हुई थी|  गैटोर में उनका अंतिम संस्कार किया गया। इनकी 27 रानियां थी, जिनमें से तीन इनकी चिता के साथ ही सती हो गयी थी | उन रानियों की छतरी आज भी जयपुर में आमेर मार्ग पर जलमहल से पहले है। इनके तीन बेटे सबसे बड़े शिवसिंह, मंझले ईश्वरसिंह और सबसे छोटे माधोसिंह थे |          


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