Loading

Enquiry
Enquiry
digital advertising
Contact Form

भारत में दलहन की स्थिति और समस्याएं

भारत में दलहन महत्वपूर्ण फसल है तथा यहां कि अधिकतर जनसँख्या भोजन के लिए दालों पर ही आश्रित है, दुनिया में दालो की कृषि 70.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जिससे 61.5 मिलियन टन उत्पादन होता है । दलहनो की विश्व औसत उपज 871 किग्रा. प्रति हेक्टेयर है। भारत में दालों का उत्पादन मांग की तुलना में कम है। इससे बढ़ती जनसंख्या से दलहनों की प्रति व्यक्ति खपत कम होती जा रही है। 2005-06 के, दौरान देश में दलहनों का कुल उत्पादन 134 लाख टन था जो 2006-07 में, बढ़कर 142 लाख टन तथा 2007-08 में, बढ़कर 148 लाख टन हो गया था। दलहनो का उत्पादन बढ़ने की बजाय 2008-09 में, 145.7 लाख टन तथा वर्ष 2009-10 में, 147 लाख टन रह गया था। देश में दालों की कमी होना कोई नई बात नही है क्योंकि उत्पादन की तुलना में खपत ज्यादा होती है। एक अनुमान के मुताबिक देश में दालों की सालाना खपत लगभग 180 लाख टन होती है जबकि उत्पादन 130 से 148 लाख टन के बीच होता है। इस तरह से देश में 30-40 लाख टन दालो की कमी होती है । अपनी खपत को पूरा करने के लिए भारत को प्रतिवर्ष 25-30 लाख टन दालों का आयात करना होता है। वर्तमान समय में दालो की कीमतें आसमान छू रही है । इससे देश में दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी कम होती जा रही है। 1951 में, प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता 60 ग्राम थी जो 2010 में, घटकर 34 ग्राम के आसपास थी जबकि अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व खाद्य तथा कृषि संगठन के मुताबिक प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 104 ग्राम दालों की सस्तुति है। दालो की उपलब्धता में वृद्धि करने और इनके मूल्यों पर नियंत्रण के लिए भारत सरकार ने दालों के निर्यात पर 2006 से लगी पाबंदी को बढ़ा दिया है।
देश में दलहनी फसलो का उत्पादन विकसित देशो की अपेक्षा बहुत कम है। 1971-2010 तक भारत में दलहनी फसलो के अन्तर्गत केवल 10 % क्षेत्र में वृद्धि हुई है। पिछले 20 सालों में   दलहनो की औसत उपज अमूमन स्थिर 1990 में, 580 किग्रा. प्रति हेक्टेयर से 2010 में, लगभग 607 किग्रा. प्रति हेक्टेयर भारत में सबसे अधिक 77% दलहन उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यो  में मध्य प्रदेश 24 %, उत्तर प्रदेश 16 %, महाराष्ट्र 14%, राजस्थान 6%, आन्ध्र प्रदेश 10% और  कर्नाटक 7% राज्य है। बाकि 23 % उत्पादन में गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड राज्यो की भागेदारी है। भारत में प्रति व्यक्ति कम से कम दालो की न्यूनतम उपलब्धता 50 ग्राम प्रति दिन तथा बीज आदि के लिए 10 % दलहने उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 2030 तक 32 मिलियन टन दलहन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है जिसके लिए हमें सालाना उत्पादन में 4.2 प्रतिवर्ष की वृद्धि करनी होगी। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी है कि दलहनी फसलो की खेती भी अच्छी भूमि में बेहतर सस्य प्रबंधन के आधार पर ही की जाए।

कम दलहन उत्पादन के प्रमुख कारण क्या है 
सुनिश्चित मूल्य, सुनिश्चित बाजार के कारण ही चार प्रमुख फसलों, गेहूं, चावल, गन्ना, कपास का उत्पादन बढ़ा है। बाजार केवल इन चार फसलों पर ही टिका है । इस वजह से दालों का उत्पादन नहीं बढ़ पाया है। फिर भी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तो घोषित कर रही है, लेकिन  पैदावार की सरकारी खरीद की कोई कारगर प्रणाली नही है। निश्चित खरीद न होने की वजह से  किसानों को बाजार में कम मूल्य पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है। इस कारण किसानों का दालों की खेती से रुझान कम होता जा रहा है। देश में ऐसे क्षेत्रों को चिह्निंत किया जाना चाहिए, जहां दालों की खेती को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। और इसके पश्चात धान-गेहूँ की भांति मंडियों का जाल बिछाया जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य में  वृद्धि के साथ सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि दलहन की पूरी उपज की सरकारी खरीद की जाये। दालों के उत्पादन के लिए बहुत ज्यादा उपजाऊ जमीन और ज्यादा पानी की जरूरत नही होती। साथ ही दालों का उत्पादन मिट्टी में नाइट्रोजन के स्तर को भी बढ़ाता है। दालों की कृषि को बढ़ावा देने से देश टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ेगा और किसान भी गरीबी के चक्रव्यूह से निकल जायेंगे । दलहन उत्पादन से संबंधित रणनीति बनाने से पहले देश में दलहनों की औसत पैदावार कम होने के कारणो की व्याख्या करना बहुत जरूरी है। दलहन उत्पादन के प्रमुख कारणों का विवरण यहां दिया गया है -

1. जलवायु सम्बन्धी कारण  
दलहनी फसलें जलवायु के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। सूखा, निम्न और उच्च तापमान, पाला, जल मग्नता का दालों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारत में 87 % क्षेत्र में दालों की खेती वर्षा पर आश्रित है। उत्तरी भारत में पाले के प्रकोप से दालों विशेषरूप से अरहर, चना, मटर, मसूर आदि का उत्पादन कम हो जाता है। तराई क्षेत्र में मृदा आद्रता ज्यादा होने के कारण उकठा रोग से दलहनों को बहुत नुकसान होता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़    में सूखे के प्रभाव से दलहन उत्पादन बहुत कम होता है।

2. उच्च उपज वाली किस्मो की कमी के कारण 
दालें प्राचीन काल से ही सीमान्त क्षेत्रों में उगाई जाती है आज भी व्यावसायिक फसलों की श्रेणी में न आने की वजह से इन फसलों पर सीमित शोध कार्य हुए है जिसके परिणामस्वरूप उच्च गुणवत्ता वाली लागत संवेदी किस्में उपलब्ध नही है। दलहनी फसलों में कीटरोग और सूखा रोधी का अभाव है।

3. अवैज्ञानिक सस्य प्रबन्ध का कारण 
दालों की खेती बहुत से किसान अवैज्ञानिक ढंग से करते है जिस वजह से वांछित उपज नहीं होती है। प्रमुख सस्य प्रबन्ध कारण निम्नलिखित हैं-
(1) खराब प्रबन्ध स्तर- शुष्क तथा सीमान्त क्षेत्रों के किसानों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है जिससे वे उन्नत किस्म के बीज, उर्वरक आदि का इस्तेमाल नहीं कर पाते। इसके अलावा फसलो में जल प्रबन्ध, खरपतवारों, कीट,रोगो का प्रबन्धन भी नहीं हो पाता जिस वजह से  उत्पादन कम होता है।
(2) राइजोबियम जीवाणुओं के संवर्ध की उपलब्धता न होना: दलहनी फसलों के लिए भिन्न-भिन्न  जीवाणु संवर्ध की जरूरत होती है, लेकिन सभी दलहनों के जीवाणु संवर्ध अभी तक उपलब्ध नहीं है। इसके साथ ही राइजोबियम जीवाणुओं के लिए उचित तापक्रम नियंत्रक न होने की वजह  से अधिकतर संवर्धन प्रभावहीन हो जाते हैं जिससे उचित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाता।
(3) समय पर बुआई का न होना - सिंचाई सुविधा न होने की वजह से सामान्यतः दलहनी फसलो की अगेती बोआई होती है जिस वजह से दलहनो की वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा हो जाती है तथा उत्पादन कम होता है।
(4) दोषयुक्त बुआई विधि के कारण - आमतौर पर दलहन फसलों की बुआई छिटकवाँ विधि से होती हैं जिस वजह से बीज अंकुरण एकसार नहीं होता है और प्रति इकाई ईष्टतम पौध संख्या स्थापित नहीं हो पाती। निंदाई, गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण भी ढंग से नहीं हो पाता, जिससे फसल उत्पादन कम होता है।
(5) कीट व रोग नियंत्रण में असमर्थता - दलहन फसल में प्रोटीन पदार्थ अन्य फसलों की अपेक्षा ज्यादा होने से वे सरस होते हैं जिसके कारण कीट रोग ज्यादा लगता है। सीमान्त क्षेत्रों के किसान आर्थिक तंगी, अज्ञानता की वजह से पौध संरक्षण उपायों को नहीं अपनाते जिससे उत्पादन में भारी कमी आती है।

4. कम उत्पादन के जैविक कारण
असीमित पौध वृद्धि के कारण - दलहनी पौधों की प्रकृति असीमित वृद्धि वाली होती है जिस वजह से पौधे के अग्रभाग की वृद्धि सतत् रूप से होती है तथा पत्तियों के कक्ष में फूल और फलियों का निर्माण भी होता रहता है। इससे जब नीचे वाली फलियां पकती है तब ऊपर वाली फलियाँ अपरिपक्व रहती हैं और जब ऊपर वाली फलियां पकती है तब नीचे वाली फलियों के दाने झड़ने लगते हैं। इस तरह से उपज में भारी कमी होती है।
(2) प्रकाश, ताप के प्रति संवेदनशीलता - दलहनी फसलें प्रकाश और ताप के प्रति बहुत  संवेदनशील होती हैं यानि इनमें पुष्पन की क्रिया मौसम और जलवायु पर आश्रित होती है। वर्षा पोषित क्षेत्रों में संचित नमी का इस्तेमाल करने से बोआई जल्दी कर दी जाती है, जिससे फसल की वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा हो जाती है। पौधे प्रकाश संवेदी होने की वजह से उनमें पुष्पन तभी होता है जब उन्हें उचित प्रकाश और ताप मिलता है। इसके विपरीत देर से बोआई करने से  फसल की वानस्पतिक वृद्धि बहुत कम हो पाती है, क्योंकि जैसे ही पौधों को उपयुक्त मौसम मिलता है, उनमें पुष्पन आरम्भ हो जाता है। इस तरह से दोनों ही परिस्थितियों में उत्पादन प्रभावित होता है।
(3) धान्य फसलें स्टार्च की आपूर्ति के लिए उगाई जाती है, और दलहनी फसलें प्रोटीन से भरपूर बीजों के लिए उत्पादित की जाती है। प्रोटीन के निर्माण में फसल को अधिक ऊर्जा व्यय करनी होती है और फोटोसिंथेट की ज्यादा मात्रा की जरूरत होती है, और स्टार्च उत्पादन में इसकी कम जरूरत होती है इस कारण दलहनी फसलों की उत्पादकता, कटाई सूचकांक धान्य फसलों की अपेक्षा बहुत कम होता है।
(4) दलहनी फसलों में फूलों का झड़ना, और फलियों के चटकने जैसी पैतृक समस्याएं विद्यमान होती हैं, जो निश्चय ही इनका उत्पादन कम करते है। दलहनी फसलो में कीट व्याधियों का प्रभाव  भी ज्यादा होता है।
(5) कम उत्पादन के संस्थागत कारण - दालों की क्षेत्रवार उत्पादन तकनीक और उपलब्ध तकनीक का प्रसार न होने की वजह से किसान परंपरागत विधि से ही इनकी कृषि करते आ रहे है। उन्नत किस्म के कृषि यंत्रों की उचित व्यवस्था तथा भंडारण का अभाव बना हुआ है। दलहनों में प्रोटीन की अधिक की वजह से भंडारण के समय भी इनमें कीट रोग का प्रकोप ज्यादा होता है। भंडारण की उचित व्यवस्था न होने तथा दाल मिलों की कमी की वजह से कटाई के पश्चात  दलहनो को कीट व्याधियो से बहुत हानि होती है जिससे दालो का उत्पादन कम होता है।
(6) दालों के कम उत्पादन की सामाजिक बाधायें - सीमान्त क्षेत्रों के किसानों में यह आम धारणा  है कि दलहनों की कृषि फायदेमंद नही है। इसलिए इनकी खेती कम उपजाऊ भूमि में बिना  खाद और उर्वरक के ही की जाती है। इसके साथ ही दलहनों को अधिकतर क्षेत्रों में मिश्रित फसल के रूप में उगाया जाता है। इससे इनकी उपज कम मिलती है।
दलहन उत्पादन बढ़ाने की संभावनायें निम्नलिखित है -
(1) प्राचीनकाल से ही उन्नत बीज कृषि का आवश्यक अंग रहा है।  उर्वर भूमि के पश्चात कृषि के लिए उन्नत बीज को ही महत्व दिया जाता है। उन्नत बीज सिर्फ शुद्ध किस्मो से ही मिलता है और स्वस्थ और अच्छे बीज से ही उत्तम फसल प्राप्त हो सकती है। देशी किस्मों की तुलना में उन्नत किस्मों से उत्पादन को दोगुना किया जा सकता है। वर्तमान समय में नये बीजों द्वारा पुराने बीजों का विस्थापन सिर्फ 7% ही है, जो कम से कम 15 - 20% होना चाहिए। इसलिए दलहनों के  उत्पादन में वृद्धि के लिए उन्नत किस्मो के प्रमाणित बीजों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।
(2) प्रकाश और ताप असंवेदी बीजों की किस्मो के विकास की जरूरत है जिससे फसल की परिपक्वता एक साथ होने से ही कटाई एक साथ संभव हो सके।
(3) किसानो को समय पर जरूरी गुणवत्तापरक आदान-उर्वरक, बीज, राइजोबियम कल्चर, उपकरण आदि उचित दर पर उपलब्ध होने चाहिए ।
(4) दलहनी फसलों की बोआई छिंटकवाँ विधि द्वारा न करके कतारो में करनी चाहिए तथा आवश्यकता के अनुसार खरपतवार और कीट, रोग नियंत्रण उपाय अपनाने चाहिए।
(5) वर्तमान में प्रति इकाई दलहनों का उत्पादन बहुत कम है। उन्नत विधि से कृषि करके उत्पादन में प्रति हेक्टेयर 2 से 4 क्विंटल की वृद्धि की जा सकती है जिससे राष्ट्रीय उत्पादन और  प्रति व्यक्ति उपलब्धता में वृद्धि हो सकती है। क्योंकि अनुसंधानों के साथ ही किसानों के खेतों पर डाले गये प्रदर्शनों में अरहर से 58 तथा मूंग की उपज में 55 % की वृद्धि दर्ज की गई।
(6) धान्य फसलो के साथ ही दलहनों की बहुफसली पद्धति और अंतः फसली खेती करके अतिरिक्त लाभ अर्जित किया जा सकता है।
(7) धान उत्पादक क्षेत्रों में, धान के खेतों की मेड़ पर 2 से 4 कतारे अरहर की लगाकर बोनस उपज का फायदा उठाया जा सकता है।
(8) खरीफ तथा रबी फसलों के मध्य सिंचित क्षेत्रों में मूंग, लोबिया, उड़द आदि की कृषि सरलता  से की जा सकती है ।
(9) दलहनी फसलो में 1-2 सिंचाई से ही उपज में अच्छी बढ़ोतरी की जा सकती है ।
(10) खरीफ ऋतु में होने वाली दलहनी फसल हेतु खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था करने से उपज में निश्चित वृद्धि होती है । ज्यादा वर्षा या जलभराव से फसल को हानि होती है।
(11) दलहनी फसलो में कीट, रोगो का प्रभाव ज्यादा होता है जिससे उपज में बहुत हानि हो  जाती है। समय पर पौध संरक्षण के उपाय अपनाने से उपज में वृद्धि की जा सकती है।
(12) दलहनों की समर्थन मूल्य पर खरीदी करने की व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए तथा दलहनो  के प्रसंस्करण की सुविधा और भंडारण की उचित व्यवस्था करने से दलहनों की कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है।


Binoculars/Information