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क्या है कृषि रसायन

एग्रो-केमिकल्स अथवा कृषि रसायन ऐसे उत्पादों की एक ऐसी श्रेणी है जिसमें सभी कीटनाशक रसायन और रासायनिक उर्वरक शामिल किये जाते है, वैसे तो ये रसायन किसानों के लिए बहुत  महंगे हैं लेकिन इनका प्रयोग अच्छे उत्पादन के लिए दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है, यदि इनका इस्तेमाल सही मात्रा और उचित विधि से किया जाए तो ये किसानों के लिए अच्छी आय के अवसर प्रदान कर सकते है, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल मिट्टी की प्रकृति तथा स्थानीय वातावरण पर निर्भर होता है, रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से पहले मिट्टी की जांच अवश्य करवानी चाहिए जिससे सिर्फ कमी वाले तत्त्वों का पता लगाकर उनकी भरपाई हो सके, उदाहरण - यदि किसी मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी है तो इसकी पूर्ति यूरिया से की जा सकती है जिससे निर्धारित लक्ष्य के मुताबिक फसल की अधिकतम उत्पादकता को हासिल किया जा सके. आमतौर पर प्रयोग किये जाने वाले कृषि रसायनों में डाइअमोनियम फोस्फेट, जिंक सल्फेट, यूरिया, एन.पी.के, पोटैशियम सल्फेट, बोरेक्स, फेरस सल्फेट और मैगनीज सल्फेट आदि शामिल है. कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए रासायनिक कीटनाशकों की भूमिका से नकारा नही जा सकता क्योंकि इनके प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि होती है और विदेशी आयात में भी बचत प्राप्त होती है. लेकिन इनका इस्तेमाल देश की खेती के लिए आज अभिशाप बन गया है देश की मिट्टी को बर्बादी की कगार पर लाकर छोड़ दिया है I किसानों की आत्महत्या करने के पीछे इन रसायनों का पूरा हाथ है 

कीटनाशकों का अधिक इस्तेमाल  
भारत में करीब 600 ग्राम कीटनाशक प्रति हैक्टेयर की खपत होती है जबकि विकसित देशों यानि जापान, चीन में यह 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भी ज्यादा है. भारत में कीटनाशकों की खपत कम होने की सबसे बड़ी वजह है छोटे किसान, जिनके पास बहुत कम मात्रा में कृषि योग्य भूमि है. इनकी क्रय शक्ति कम होती और ये अपने खेतों में उन्नत बीज तथा कृषि रसायनों का इस्तेमाल कम ही कर पाते. कीटनाशकों की सबसे ज्यादा खपत उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्, पंजाब और हरियाणा में होती है. हमारे देश में पंजाब ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पर किसान हर दिन नए कीटनाशक, बीजों की खेती करने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं क्योंकि उन्नत कृषि और ज्यादा उपज के लिए इन्हीं का महत्त्व सबसे ज्यादा आंका गया है. 
कीटनाशकों की इस श्रेणी में वे कृत्रिम रसायन, उपकरण और जीवाणु आते हैं जिन्हें रोग फ़ैलाने वाले कीड़ों, परजीवियों को मारने, भगाने या नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. कीटनाशक अपने संगठन के मुताबिक कार्बनिक और अकार्बनिक प्रकृति के भी हो सकते हैं. कार्बनिक कीटनाशकों में ओर्गैनो-फोस्फेट, कार्बामेट, थायोसाइनेट, ओर्गैनो-क्लोरीन एवं एंटीबायोटिक आदि शामिल है. कीटनाशकों का प्रभाव उनके प्रयोग करने की विधि पर आश्रित होता है क्योंकि सभी कीटनाशकों की अवशोषण क्षमता भी अलग तरह की होती है. यह मिटटी के गुणों, कार्बनिक पदार्थों की मात्रा आदि पर निर्भर करता है. कुछ कीटनाशक पाउडर के रूप में होते हैं जिन्हें सीधे मिट्टी में मिला देते है. कुछ कीटनाशक स्प्रे किए जाने वाले होते है जो स्थानीय वातावरण और सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर करते है. डाइथेन एम-45, जेड-78, फाईटोलान अथवा ब्लिटोक्स-50 कुछ ऐसी स्प्रे हैं जिन्हें फफूंदनाशक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. कई बार विभिन्न संक्रमणों से बचाव के लिए भी बीजों को रसायनों से उपचारित किया जाता है जिससे उगने वाले पौधों को रोगों से बचाया जा सके. डाइनिकोलाजोल, प्रोपिकोनाजोल और टेबुकोनाजोल आदि कुछ ऐसे ही रसायन हैं जिन्हें 2 ग्राम या फिर 2 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज के लिए प्रयोग में लाया जाता है जिससे ये पूरी तरह रोगमुक्त रहे. देश में प्रत्येक वर्ष अत्याधुनिक कीटनाशकों का प्रयोग लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इनका इस्तेमाल पहाड़ी इलाकों में कम लेकिन मैदानी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा होता है. क्योकि मैदानी क्षेत्रों में कीटों का प्रभाव ज्यादा होता है यहाँ की जलवायु इनके जीवित रहने के लिए अनुकूल होती है. 

कीटनाशकों के दुष्प्रभाव क्या है 
कुछ कीटनाशक मिट्टी में मिलकर खत्म नहीं होते और बारिश होने पर भूमि के नीचे चले जाते हैं. इन्हें पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे ये भोजन के माध्यम से मनुष्यों के शरीर में प्रवेश कर जाते है. कीटनाशकों द्वारा कुछ ऐसे जीव भी समाप्त हो जाते हैं जो हमारी फसलों एवं मिट्टी के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. कई बार इनके ज्यादा इस्तेमाल से हमारी अमूल्य जैव विविधता के समाप्त होने का खतरा भी बन जाता है. इसलिए इनका प्रयोग आवश्यकता के अनुसार ही सोच समझकर करना चाहिए जिससे पर्यावरण और जीवों का इनके हानिकारक प्रभाव से बचाव किया जा सके. भारत में सबसे पहले प्रयोग किया जाने वाला कीटनाशक डी.डी.टी. था, जो आज भी हमारी मिट्टी एवं जल को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रहा है. भारतीय किसान कीटनाशकों के इस्तेमाल के प्रति अभी ज्यादा सजग नहीं हैं.
अमेरिका, जापान और चीन के पश्चात भारत ही कृषि रसायन का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. भारत में तीन प्रकार की कम्पनियां जिसमे बहुराष्ट्रीय, सरकारी क्षेत्र और लघु उद्योग मिलकर एग्रो-केमिकल्स का उत्पादन करती हैं. देश के सकल एग्रो-केमिकल्स बाजार का 80% नियंत्रण, 10 कंपनियों के नियंत्रण में है. सभी फसल रक्षक रसायनों के बाज़ार का 60% हिस्सा कीटनाशकों की बिक्री से ही मिलता है. ये रसायन ज्यादातर धान और रुई की खेती में इस्तेमाल किए जाते हैं. अब तो धान, गेहूँ, फलों व सब्जियों की फसलों पर भी कीटनाशक के रूप में जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होने लगा है लेकिन इन जैव कीटनाशकों का बाज़ार वर्तमान समय में सकल कीटनाशकों के बाज़ार का सिर्फ 3% हिस्सा है. पिछले कुछ सालों में भारत से निर्यात होने वाले कीटनाशकों में बहुत वृद्धि हुई है. वैश्विक स्तर पर भी भारत कीटनाशकों का 13वां सबसे बड़ा निर्यातक देश है. भारत सामान्यतः ब्राज़ील, अमेरिका, फ्रांस और नीदरलैंड को भी कीटनाशक निर्यात करता है. भारतीय कीटनाशक सस्ते तथा प्रभावशाली होने की वजह से दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं.


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