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योगगुरु रामदेव के संघर्ष की कहानी

बाबा रामदेव 12 दिसम्बर 1965 को, हरियाणा जिले के महेन्द्रगढ़ जिले में स्थित नारनौल नाम के गाँव में पैदा हुए थे | रामदेव के पिता का नाम राम यादव तथा माता का नाम गुलाबो यादव था इनके माता-पिता दोनों ही अशिक्षित थे फिर भी उन्होंने रामदेव को पढ़ाया| रामदेव का नाम उनके माता पिता ने रामकृष्ण यादव रखा था | रामदेव बहुत कुशाग्र बुद्धि के बालक थे इस कारण सभी अध्यापक उनको बहुत पसंद करते थे | पांचवी कक्षा के पश्चात उन्होंने पास के गाँव शहजादपुर के विद्यालय में प्रवेश लिया क्योंकि उनका गाँव बहुत छोटा था उसमे सिर्फ प्राथमिक विद्यालय ही था |
शहजादपुर में उन्होंने आठवी कक्षा तक शिक्षा ग्रहण की | रामदेव जिस गाँव में रहा करते थे उस समय उस गाँव में बिजली नही आया करती थी | रामदेव पढाई करने के लिए मिट्टी के तेल वाला लैंप जलाकर रात में पढ़ते थे | उनके पिता बहुत गरीब होने के बाद भी अपने पुत्र के लिए पुरानी किताबो की व्यवस्था कर देते थे | बाबा के बचपन में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने उन्हें योग की और आकर्षित किया | रामदेव के शरीर का बाया भाग पक्षाघात से ग्रस्त हो गया | फिर किसी ने उन्हें बताया कि पक्षाघात को सिर्फ योग से ही ठीक किया जा सकता है | उसके पश्चात बाबा रामदेव अपने उपचार हेतु गहन योग का अध्ययन, योगभ्यास करने लगे| बहुत समय तक योगाभ्यास करने के पश्चात उनका पक्षाघात वाला भाग पूरी तरह से सक्रिय हो गया था यह उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी | अपने स्वयं के उपचार के पश्चात उन्हें योग का अर्थ समझ आया कि किस प्रकार से योग से असाध्य रोगों का भी उपचार किया जा सकता है | अब रामदेव ने योग के प्रसार को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया|
आठवी कक्षा के पश्चात किशोर रामदेव ने आध्यात्म्य तथा योग में ही अपना जीवन बनाने का फैसला किया | इस विचार के कारण बाबा ने उस समय अपने घर को छोड़ दिया तथा आचार्य बलदेव के गुरुकुल चले गये जो हरियाणा के रेवाड़ी जिले के एक छोटे से गांव में था | आचार्य ने अपने नये शिष्य को वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों का पाठ पढाया | उनके यहां रहते हुए उन्होंने आत्मअनुशासन, ध्यानमग्नता का भी अभ्यास किया| रामदेव शुरू से ही स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारो से बहुत प्रभावित थे और बाबा रामदेव भी उनकी तरह एक महान विचारक बनना चाहते थे |
गुरुकुल में रहते हुए रामदेव ने योगाभ्यास करते हुए यह सीखा कि अगर उनको संसार में परिवर्तन लाना है तो उन्हें सांसारिक जीवन का त्याग अवश्य करना पड़ेगा | इसी विचार के साथ बाबा रामदेव ने संसार से वैराग्य लिया, सन्यासी का चोगा पहनकर स्वामी रामदेव नाम धारण किया | उसके पश्चात बाबा, हरियाणा के जींद जिले में आकर आचार्य धर्मवीर के गुरुकुल कल्व  में शामिल हो गये तथा हरियाणा के लोगो को योग की शिक्षा देने लगे | यहां पर वो लोगो को मुफ्त योग की शिक्षा दिया करते थे | कुछ दिनों पश्चात उन्होंने अनुभव किया कि उन्हें योग का पूर्ण ज्ञान लेने के लिए वास्तविक योगियों के पास जाना चाहिए |
उसके पश्चात वास्तविक जीवन के योगियों से मिलने की खोज में बाबा हिमालय की यात्रा पर निकल गए | यहां उनकी भेंट कई योगियों से हुई जो उस हिमालय पर आश्रम बनाकर रहा करते  थे | उन्होंने उन योगियों से योग तथा ध्यान की गहराई सीखी | अब वो स्वयं गंगोत्री ग्लेशियर पर  ध्यान में लीन हो गये तथा असली योग का अभ्यास करने लगे | यहां रहते हुए उन्हें अपने जीवन के वास्तविक ध्येय का पता चला| कुछ समय रहने के पश्चात उनको अनुभव हुआ कि यदि योग का अभ्यास करते हुए मेरा जीवन यही खत्म हो गया तो मेरा ज्ञान भी मेरे साथ ही खत्म हो जाएगा , इसके लिए मुझे कुछ और सोचना चाहिए” |
अब वो अपनी इस नई सोच के साथ आचार्य बालकृष्ण तथा आचार्य बालवीर से मिले, जिन्होंने उनके मिशन में उनको पूर्ण सहयोग किया| इसके साथ हिमालय पर ही उनकी भेंट आचार्य मुक्तानन्द व आचार्य वीरेन्द से हुई|  इन्ही सब आचार्यो की सहायता से वो योग के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए हिमालय छोडकर हरिद्वार आ गये | और हरिद्वार से ही उन्होंने अपने जीवन की एक नई राह का आरम्भ की | यहां उन्होंने पतंजलि योगपीठ की स्थापना की जहां आज भी अनेकों छात्र-छात्राएं योग की शिक्षा ग्रहण करते है उन्होंने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड कंपनी की भी स्थापना की है जो हर्बल उत्पाद बनाती है


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