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भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highway)

राष्ट्रीय राजमार्ग, केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित और संभाली जानी वाली लंबी दूरी की सड़क है। ये सड़के अधिकतर 2 पंक्तियो की होती है, भारत के राजमार्गो की कुल दूरी करीब  58,000 किमी0 है, जिसमें से सिर्फ 4,885 किमी0 की सड़को के बीच ही पक्का विभाजन बनाया गया है। राजमार्गो की लंबाई भारत की सड़को का सिर्फ 2 प्रतिशत है, फिर भी ये कुल यातायात का करीब 40 प्रतिशत भार उठाते है। 1995 में, पास संसदीय विधेयक के अंतर्गत इन राजमार्गो को बनाने व रखरखाव के लिए निजी संस्थानो की भागेदारी को स्वीकृति दी गई। हाल ही में इन राजमार्गो का विकास तेजी से हुआ है और कुछ शहरो के मध्य 4 व 6 पंक्तियों के राजमार्गो का विकास हुआ। देश का सबसे बड़ा राजमार्ग NH7 है, जो उत्तर प्रदेश के वाराणसी को भारत के दक्षिणी कोने यानि तमिलनाडु के कन्याकुमारी शहर से जोड़ता है। इसकी कुल लंबाई 2369 किमी0 है। देश का सबसे छोटा राजमार्ग 6 किमी0 लंबा NH47A है, जो एरनाकुलम को कोची बंदरगाह से जोड़ देता है।
अधिकतर राजमार्गों को कंक्रीट का नहीं बनाया गया। जबकि मुम्बई पुणे एक्सप्रेस-वे इसका एक अपवाद ही है। इस वक्त राजमार्गों की कुल लंबाई का नेटवर्क 70548 किमी0 है। 
राष्‍ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना की उपलब्‍धियां चरण I और चरण II की गतिविधियां इस प्रकार निम्नलिखित हैं :
4 महानगरों - दिल्‍ली, मुंबई, चेन्‍नई तथा कोलकाता को 5846 किमी0 लंबी राजमार्ग से जोड़ने वाली योजना स्‍वर्णिम चतुर्भुज है जो उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्‍चिम कॉरिडोर जिसकी लंबाई 7142 किमी0 है और जो कोच्‍चि-सेलम स्‍पर मार्ग समेत श्रीनगर को कन्‍याकुमारी व सिलचर को पोरबंदर से जोड़ती है भारत के 12 प्रमुख बंदरगाहों को जोड़ने वाले 380 किमी0 लंबे राष्‍ट्रीय राजमार्ग को 4 लेन बनाए जाने का प्रस्‍ताव है। एनएचडीपी के प्रथम व द्वितीय चरण के अंतर्गत कुल 14,145 किमी0 लंबाई के राष्‍ट्रीय राजमार्ग के निर्माण तथा नवीनीकरण के लिए 80,626 करोड़, रुपए का अनुमानित व्यय होगा। पहले राजमार्गों की संख्या 77 थी जो अब बढ़कर 228 हो गई है 

राष्ट्रीय राजमार्गों में सरकारी तथा निजी साझेदारी
शुरू से ही सड़क परियोजनाओं ने बजट अनुदान से ही धन प्राप्‍त किया, सरकार की तरफ से नियंत्रण व निगरानी होती रहती है। पहले सड़क निर्माण में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बहुत सीमित रहती थी। सड़कों पर लगातार बढ़ते यातायात को ध्यान में रखते हुए सड़क परियोजनाओं को बजट प्रावधान के जरिये धन उपलब्‍ध कराने का परंपरागत तरीका कारगर साबित नहीं हुआ। और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने बहुत से कदम उठाये है 


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