Loading

Enquiry
Enquiry
digital advertising
Contact Form

प्रतिपदार्थ क्या है? प्रतिपदार्थ की श

प्रकृति ने इस ब्रह्माण्ड में हर वस्तु जोड़े से बनाया है। भौतिकी की नयी खोजों ने सूक्ष्मतम स्तर पर हर कण का प्रतिकण ढूंढ निकाला है। जब साधारण पदार्थ का कण प्रतिपदार्थ के कण से टकराता है तो दोनो कण नष्ट होकर ऊर्जा मे परिवर्तित हो जाते है। प्रतिपदार्थ की खोज ने शताब्दीयों पुरानी धारणा( कि, पदार्थ और ऊर्जा अलग-अलग है) पूर्ण रूप से गलत साबित कर दी है . दोनों ऊर्जा एक ही है। ऊर्जा ही विखंडित होकर पदार्थ और प्रतिपदार्थ का निर्माण करती है। इसे सरल गणितीय रूप में निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है ऊर्जा = पदार्थ + प्रतिपदार्थ
E=m c2 (E= ऊर्जा, m = पदार्थ का द्रव्यमान, c =प्रकाशगति) 
अब आगे जानते है प्रतिपदार्थ का मूल इतिहास 
साल,1930 में पाल डीरेक ने इलेक्ट्रान तथा उसके व्यवहार की जो व्याख्या की थी,वह क्वांटम भौतिकी तथा विशेष सापेक्षतावाद के सिद्धांत दोनो के ही अनुरूप थी। इस व्याख्या की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि, इलेक्ट्रान के विपरीत कण का द्रव्यमान इलेक्ट्रान के तुल्य था लेकिन विद्युत आवेश तथा चुंबकिय गुरुत्व विपरीत था।साल 1932 में वैज्ञानिक कार्ल एण्डरसन क्लाउड चेम्बर मे ब्रह्मांडिय विकिरण(Cosmic Rays) द्वारा बनाये गये पथ का अध्ययन कर रहे थे। उन्होने देखा कि, एक कण ने इलेक्ट्रान जैसे ही पथ बनाया था लेकिन चुम्बकीय क्षेत्र में उसके पथ का झुकाव उसके धनात्मक विद्युत आवेश को दर्शाता था। कार्ल ने इस कण का नाम पाजीट्रान रखा। कार्ल द्वारा खोजा गया पाजीट्रान, पाल डीरेक द्वारा पूर्वानुमानित प्रति-इलेक्ट्रान था।साल,1950 मे लारेंस विकिरण प्रयोगशाला ने बेवाट्रान त्वरक प्रति-प्रोटान खोज निकाला, जो द्रव्यमान तथा स्पिन मे प्रोट्रान के जैसा लेकिन ऋणात्मक विद्युत आवेश तथा प्रोटान के विपरित एक चुंबकीयगुरुत्व त्वरण था। प्रतिप्रोटान के निर्माण के लिए कण त्वरण में प्रोटान को अत्याधिक ऊर्जा पर दूसरे प्रोटानो से टकराया जाता है। इस क्रिया मे कभी कभी प्रारंभिक दो प्रोटानो के अतिरिक्त प्रोटान-प्रति प्रोटान युग्म का निर्माण होता है। इसके हर कण का एक प्रति कण होता है।एक कण तथा प्रतिकण आपस में टकराने पर नष्ट होकर ऊर्जा मे परिवर्तित हो जाते है। यह ऊर्जा आइंस्टाइन के समीकरण E=m c2 से मापी जा सकती है। उदाहरण के लिए एक इलेक्ट्रान तथा पाजीट्रान(प्रति इलेक्ट्रान) के टकराने से 511 इलेक्ट्रान वोल्ट की दो गामा किरणे उत्पन्न होती है। ये दोनो गामा किरणे दो विपरित दिशाओ में प्रवाहित होती है क्योंकि ऊर्जा तथा संवेग का संरक्षण जरूरी है। जब  प्रोटान तथा प्रतिप्रोटान टकराते है तब कुछ अन्य कणो का निर्माण होता है लेकिन कुल उत्पन्न ऊर्जा तथा नये कणो के द्रव्यमान का योग प्रोटान तथा प्रतिप्रोटान के द्रव्यमान योग के तुल्य होता है।प्रतिपदार्थ के निर्माण में लगे वैज्ञानिको ने प्रति हाइड्रोजन का निर्माण भी कर लिया है। प्रति हाइड्रोजन का निर्माण अन्य तत्वो की तुलना में सरल है क्योंकि इसके लिए प्रति प्रोटान प्रति इलेक्ट्रान होता है। प्रतिपदार्थ के निर्माण में बड़ी समस्या संग्रहण की होती है प्रतिपदार्थ साधारण पदार्थ से टकराकर ऊर्जा मे बदल जाता है 
प्रतिपदार्थ का अस्तित्व जाने - शायद बहुत से लोगो को पता ना हो लेकिन,प्रकृति के हर कण का प्रतिकण होता है। प्रकृति के हर काम के पीछे एक कारण होता है, प्रकृति द्वारा बनाई गई कोई भी वस्तु व्यर्थ नही है।इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें प्रतिपदार्थ की खोज की प्रक्रिया को विस्तार से समझना होगा। क्वांटम भौतिकी के अनुसार इलेक्ट्रान के कणो की व्याख्या किसी बिंदु के कण की बजाए श्रोडींगर के तरंग से की जा सकती है। यह तरंग कण की बिंदू पर होने की संभावना दर्शाती है। यह सुनने में थोड़ा अटपटा लगे लेकिन सूक्ष्म स्तर पर प्रकृति विचित्र व्यवहार करती है। इस स्तर पर किसी भी कण की एक निश्चित अवस्था ज्ञात करना असंभव है, हम कण के किसी बिंदू पर उसकी होने वाली संभावना ही ज्ञात कर सकते है। यह संभावना एक तरंग के रूप में व्यक्त की जाती है।पाल डीरेक ने श्रोडींगर के तरंग सिद्धांत मे एक दोष खोज निकाला था श्रोडींगर का तरंग सिद्धांत कम ऊर्जा पर इलेक्ट्रान के व्यवहार की व्याख्या करता था लेकिन उच्च ऊर्जा पर यह इलेक्ट्रान के व्यवहार की व्याख्या नही कर पाता था। उच्च ऊर्जा पर कण आइंस्टाइन के सापेक्षता वाद के सिद्धांत का पालन करते थे। पाल डीरेक ने श्रोडींगर के समीकरण मे परिवर्तन कर उसे आइंन्सटाइन के सापेक्षतावाद के समीकरण से जोड़ दिया अर्थात दोनो सिद्धांत का एकीकरण कर दिया। पूरा विश्व आश्चर्यचकित रह गया। इलेक्ट्रान  श्रोडींगर तरंग सिद्धांत के साथ सापेक्षतावाद के दोनो सिद्धान्त का पालन करता था। पाल डीरेक ने यह काम शुद्ध गणितिय रूप से किया था, इसका प्रायोगिक सत्यापन शेष था। इलेक्ट्रान के लिए नया समीकरण बनाते वक्त डीरेक ने पाया की आइंस्टाइन का प्रसिद्ध समीकरण E=m c 2 पूरी तरह से सत्य नही है। सही समीकरण है E=±m c 2 ।(किसी भी संख्या का वर्गमूल करने पर परिणाम धनात्मक या ऋणात्मक दोनो होता है।) भौतिक विज्ञानी ऋणात्मक ऊर्जा से नफरत करते है। भौतिकी का सिद्धांत बताता है कि, कोई भी पिंड हमेशा निम्न ऊर्जा की अवस्था प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।चूंकि पदार्थ हमेशा निम्न ऊर्जा अवस्था में  प्राप्त करने का प्रयास करता है, परन्तु ऋणात्मक ऊर्जा का सिद्धांत विनाशकारी था। इसका अर्थ था  सारे इलेक्ट्रान अनंत ऋणात्मक ऊर्जा की अवस्था में चले जायेंगे, यह डीरेक के सिद्धांत के साथ ब्रह्मांड को अस्थायी बनाता था।इस सिद्धान्त के पश्चात डीरेक ने एक नया सिद्धांत “डीरेक सागर विकसित" किया। इसके मुताबिक सभी ऋणात्मक ऊर्जा अवस्थायें भरी हुई है, इसका कारण इलेक्ट्रान का ऋणात्मक अवस्था में नही जा पाना है  यह ब्रह्माण्ड को स्थायी बनाता था। यानी कि ,यदि किसी ऋणात्मक ऊर्जा अवस्था के इलेक्ट्रान से गामा किरण टकरायेगी  तो वह उसे धनात्मक ऊर्जा अवस्था मे पहुंचा देगी। इससे हमे यह लगेगा कि ’गामा किरण’ ऊर्जा से एक इलेक्ट्रान तथा ’डीरेक सागर मे एक छेद’ के युग्म मे परिवर्तित हो जाएगी ।गामा किरण(ऊर्जा) = इलेक्ट्रान + ’डीरेक सागर मे एक छेद’ (प्रति इलेक्ट्रान)
डीरेक सागर का छेद निर्वात मे एक बुलबुले के रूप में था जिसका आवेश धनात्मक था तथा द्रव्यमान इलेक्ट्रान के बराबर था।  


Binoculars/Information