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प्रथम रिपब्लिकन अमेरिकी राष्ट्रपति अ

अब्राहम लिंकन ,अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे. उनका कार्यकाल सन 1861 से सन 1865 तक था.ये रिपब्लिकन पार्टी से थे. उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट गृह युद्ध (अमेरिकी गृह युद्ध) से बचाया  था. अमेरिका में दासप्रथा के अंत का श्रेय भी लिंकन को ही जाता है. लिंकन सन1809 में केंट की (यू एस ए) में एक गरीब अश्वेत परिवार में पैदा हुए थे। वे प्रथम रिपब्लिकन थे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने. उससे पहले वो एक वकील, इलिअन्स स्टेट के विधायक (लेजिस्लेटर) सदस्य हुआ करते थे ।अब्राहिम दो बार सीनेट के चुनाव में असफल भी हुए थे. वकालत से लेकर कमाई की दृष्टि तक यदि  देखा जाये तो अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पूर्व अब्राहम लिंकन ने बीस वर्ष तक असफल वकालत  ही की. लेकिन उनकी वकालत से उन्हें और उनके मुवक्किलों को अत्यधिक संतोष मिला. उनके वकालत के दिनों के सैंकड़ों सच्चे किस्से उनकी ईमानदारी और सज्जनता की गवाही देते हैं.लिंकन अपने उन मुवक्किलों से कम लेते थे जो ‘उनकी ही भांति गरीब’ थे. एक बार उनके एक मुवक्किल ने उन्हें पच्चीस डॉलर भेजे तो लिंकन ने उसमें से दस डॉलर यह कहकर वापस लौटा दिए कि, पंद्रह डॉलर पर्याप्त थे. आमतौर पर वे अपने मुवक्किलों को अदालत के बाहर ही राजी नामें करके मामला निपटा लेने की सलाह देते थे. जिससे दोनों पक्षों का धन मुकदमे बाजी में बर्बाद ना हो. इसके बदलें उन्हें ना के बराबर ही फीस मिलती थी.एक शहीद सैनिक की विधवा को उसकी पेंशन के 400 डॉलर दिलाने के लिए एक पेंशन एजेंट 200 डॉलर फीस मांग रहा था.लिंकन ने उस महिला के लिए न सिर्फ मुफ्त में वकालत की बल्कि उसके होटल में रहने का खर्चा और घर वापसी के टिकट की भी व्यवस्था की.लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक बेईमान को अदालत से सजा दिलवाई. मामला अदालत में सिर्फ पंद्रह मिनट ही चला. सहयोगी वकील ने जीतने के पश्चात फीस में बंटवारें को लेकर उसे झपट दिया. सहयोगी वकील ने कहा कि, उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे. पर उन्होंने (लिंकन)  कहा  “ मैं प्रसन्न नहीं हूँ. वो रूपये एक बीमार महिला के है और मैं इन रुपयो को लेने की जगह  भूखा रहना अधिक पसन्द करूँगा. तुम मेरी फीस की रकम उसी महिला को वापस दे देना .”
आज के हिसाब से सोचें तो लिंकन बेवकूफ थे. उनके पास कभी भी कुछ बहुतायत में नही रहा और इसमें उन्हीं का दोष था. लेकिन वह हम सबमें सबसे अच्छे मनुष्य थे, क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है. लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नही करते थे. एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के विषय में पूछा. लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडिया में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ ’. यही मेरा धर्म है’।. वह अपने पिता के साथ खेत पर कार्य करते थे. वह कभी स्कूल नही गए , लेकिन खुद ही पढ़ना और लिखना सीखा . एक सफल वकील बनने से पूर्व उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियों की और धीरे – धीरे राजनीति की तरफ मुड़ गए 
देश में गुलामी की प्रथा की समस्या चल रही थी ,गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे , और वह अफ्रीका से काले लोगो को अपने खेतो में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के विरुद्ध थे और इसे खत्म करना चाहते थे अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है. इसलिए वहाँ देश में गुलामी के लिए कोई स्थान नही था,
इस मुश्किल वक्त में, अब्राहम लिंकन सन1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए. वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे. दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के विरुद्ध थे. इससे देश की एकता में खतरा आ सकता था. दक्षिणी राज्य एक नया देश बनाने की तैयारी कर रहा था लेकिन अब्राहम लिंकन चाहता था की सभी राज्य एक जुट होकर रहे 
अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा. वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे. अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के मध्य एक नागरिक युद्ध छिड़ गया. उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, ‘एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नही रह सकता वह युद्ध जीत गए और देश एक जुट ही रहा
लिंकन एक दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुने गए वह किसी के भी खिलाफ नही थे और चाहते थे कि सब लोग शांति से जीवन बिताये. और युद्ध में घायल हुए लोगों के घाव को ठीक करने का प्रयास किया सन 1862 में लिंकन ने घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगे. इससे ही लिंकन लोगो के मध्य प्रिय रहासन 1865 में लिंकन की हत्या कर दी गई .अब्राहम लिंकन  ने   अपने बेटे के स्कूल प्रिंसिपल को लिखा था। लिंकन ने इसपत्र में वो सभी बाते लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे। सम्माननीय महोदय,मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नही है। यह बात मेरे बेटे को भी सीखनी होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे वक्त लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से अधिक कीमती होता है। आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही ये भी बताया कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना आवश्यक है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्छी बात नही है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए। आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए बहुत काम की है।

 


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