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शहीद अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले में स्थित धरमपुर गांव में एक मुस्लिम दर्जी परिवार में 1 जुलाई, 1933 में पैदा हुए थे। उनके पिता मोहम्मद उस्मान आजीविका हेतु कपड़ों की सिलाई का कार्य करते थे जबकि अब्दुल हमीद की रुचि अपने इस पारिवारिक कार्य में बिलकुल भी नहीं थी। कुश्ती के दाँव पेंचों में रुचि लेने वाले पिता का प्रभाव अब्दुल हमीद पर भी पड़ा। हमीद को लाठी चलाना, कुश्ती का अभ्यास करना और पानी से उफनती नदी को पार करना, गुलेल से निशाना लगाना इन्हें बहुत पसंद था एक ग्रामीण बालक के रूप में इन सभी क्षेत्रों में हमीद बहुत पारंगत थे। उनका एक बड़ा गुण था यथासंभव सबकी मदद करने को सदैव तैयार रहना।
अब्दुल हमीद 27 दिसंबर, 1954 में ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल हुए। जम्मू कश्मीर में तैनात अब्दुल हमीद पाकिस्तान की तरफ से आने वाले घुसपैठियों की खबर लेते हुए उन्हें मजा चखाते थे, जब उन्होंने एक आतंकवादी इनायत अली को पकड़वाया तो प्रोत्साहन में उनको प्रोन्नति देकर सेना में लांस नायक बना दिया गया था। 1962 में, जब चीन ने भारत की पीठ में छुरा घोंपा तो अब्दुल हमीद उस वक्त नेफा में तैनात थे, ज्यादा समय नहीं बीता था और 1965 में, पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। अब्दुल हमीद को अपनी जन्मभूमि के प्रति अपना कर्तव्य निभाने का अवसर प्राप्त हुआ। मोर्चे पर जाने से पहले उनके अपने भाई को कहे शब्द ‘पल्टन में उनका बहुत सम्मान होता है जिनके पास कोई चक्र होता है, देखना हम जंग में लड़कर कोई न कोई चक्र लेकर जरूर लौटेंगे।” उनके स्वप्न को व्यक्त करते हैं। उनकी भविष्यवाणी पूरी हुई और 10 सितम्बर 1965 को, जब पाकिस्तान की सेना अपने नापाक इरादों के साथ अमृतसर को घेरकर अपने नियंत्रण में लेने को तैयार थी, तब अब्दुल हमीद ने पाक सेना को अपने अभेद्य पैटन टैंकों के साथ आगे बढ़ते हुए देखा। अपनी जान की परवाह न करते हुए अब्दुल हमीद ने अपनी तोप युक्त जीप को टीले के निकट खड़ा किया और गोले बरसाते हुए दुश्मन के तीन टैंक ध्वस्त कर डाले। पाक अधिकारी गुस्से में भी थे और हैरान भी थे, उनके मिशन में बाधक अब्दुल हमीद पर उनकी दृष्टि पड़ी और उनको घेरकर गोलों की वर्षा शुरू कर दी। इससे पहले वो उनके टैंक और समाप्त कर पाते, शत्रु की गोलाबारी से वो शहीद हो गये। जब वो शहीद हुए उस समय उनकी आयु मात्र 32 वर्ष थी, अब्दुल हमीद के शौर्य और बलिदान ने सेना के शेष जवानों में जोश का संचार किया और शत्रुओं को खदेड दिया गया। मरणोपरांत उन्हें सबसे बड़े सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से भी सम्मानित किया गया, जो उस समय उनकी पत्नी श्रीमती रसूली बीबी ने प्राप्त किया था। इसके साथ ही उनको समर सेवा पदक, सैन्य सेवा पदक तथा और रक्षा पदक भी प्रदान किये गए। साथ ही 28 जनवरी 2000 में, भारतीय डाक विभाग द्वारा वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पांच डाक टिकटों के सेट में 3 रुपये का एक सचित्र डाक टिकट जारी किया गया था। सैन्य डाक सेवा ने 10 सितंबर, 1979 को उनके सम्मान में एक विशेष आवरण जारी किया था।


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