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वृद्धाश्रम एक अभिशाप

 यह बहुत ही हास्यपद बात है कि मनुष्य वर्षों तक जीवित रहना चाहते हैं लेकिन वृद्ध नहीं होना चाहता.लेकिन यह एक कटु सत्य है कि किसी भी व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन की अंतिम अवस्था वृद्धावस्था होती है .मृत्यु से पूर्व जीवन में यह अवस्था अवश्य आती है. वास्तव में मनुष्य वृद्ध होने और वृद्धावस्था को जीने के लिए प्राकृतिक रूप से  बाद्ध्य होता है .वृद्धावस्था को लेकर डर एवं भय का अनुभव एक आधुनिक प्रक्रिया है .यह अवस्था जीवन विस्तार की अंतिम अवस्था है. साठ वर्ष से अधिक की आयु के लोग वृद्ध कहे जाते हैं. साठ वर्ष की आयु प्रौढ़ व वृद्ध के बीच की मध्यम रेखा है.बुढ़ापा बहुत ही दुखदायी होता है. उस उम्र में शरीर कमजोर हो जाता है और कई बीमारियाँ परेशान करने लगती हैं. साथ ही घर वालों से प्रेम और स्वीकृति न मिलने पर मन दुखी हो जाता है. ऐसे में वृद्धाश्रम या बुज़र्गों के लिए रहने का स्थान बड़ा उपयोगी सिद्ध होता है. वहां पर सब बड़ी उम्र के लोग रहते हैं. उनकी एक सी समस्याएं और दुःख होते हैं. इसलिए वे एक दूसरे को सांत्वना दे सकते हैं. वहां उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वयंसेवक और अन्य लोग होते हैं जो विशेष रूप से इस काम को करने के लिए शिक्षित होते हैं. वे प्रेम से उनकी देखभाल करते हैं.
                                           भारत में बढ़ते वृद्धाश्रम के चलन ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है. भारत जैसे देश में जहाँ माता-पिता को देवता के समान समझा जाता था, आज वहां बढ़ते वृद्धआश्रम हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं कि हमारे समाज में किस नकारात्मक तरीके से बदलाव आ रहा है. महानगरों और नगरों में आधुनिकता से जीने की ललक में हम साल भर में एक बार कोई न कोई दिवस हम जरूर मनाते हैं, जैसे मदर्स डे, फादर्स डे और अपने कर्तब्य की पूर्ति कर लेते हैं. लेकिन इन दिवसों का उन बुजुर्गों के लिए क्या मायने हैं जिनके बच्चे ठीक से बात भी नहीं करते. यह कहना गलत न होगा कि वृद्धाश्रम होना हमारे समाज के लिए कलंक हैं, किन्तु धीरे-धीरे यह समाज की सच्चाई बनता जा रहा हैं. जिन बच्चों को पालने के लिए माँ-बाप अपनी ज़िन्दगी लगा देते हैं, उनकी शिक्षा और सुविधा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं, उनको जीवन के अंतिम क्षण में अकेला छोड़ देना कितना बड़ा अपराध है, इस बात की कल्पना भी मुश्किल है. खासकर भारत जैसा देश, जहाँ लोग नाती-पोतों से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं और ऐसे में संपन्न लोगों को अपने अभिभावकों के बारे में सोचना चाहिए, उन्हें उस समय नहीं छोड़ देना चाहिए, जब उन्हें अपने बच्चों की सबसे ज्यादा जरुरत होती है.
                                         आज समय बदल रहा है, तो नई पीढ़ी की सोच तथा जीवन जीने की शैली में भी परिवर्तन हो रहा है. इसका सीधा प्रभाव परिवारों पर पड़ रहा है. आज के युवा अपने जीवन में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं, फिर चाहे वे अपने माता-पिता ही क्यों न हो! आज के युवा को अपने करियर को लेकर बहुत ज्यादा असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, तो बदलती परिस्थितियों में कोई विदेशों में बसना चाहता है तो कोई अपने ही देश में, महानगरों में भविष्य तलाशता है. इस चक्कर में वो एक जगह टिक नहीं पाते हैं और ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी उन्हें बोझ लगने लगती है. शहरों में आबादी का केंद्रीकरण और गलाकाट प्रतियोगिता भी अपने बुजुर्गों से दुराव का एक बड़ा कारण है. ऐसे में, वे इस बोझ से छुटकारा पाना चाहते हैं और वृद्धाश्रम के रूप में उन्हें समस्या का 'विकलांग समाधान' मिल जाता है. बेचारे बुजुर्ग अपना सारा जीवन और जीवन की सारी कमाई अपने बच्चों पर लुटाने के बाद खाली हाथ और बेबस हो कर आश्रम जाने को मजबूर हो जाते हैं और फिर जीवन के बाकी दिन अपने परिवार से दूर रह कर तड़पते रहते हैं, सिसकते रहते हैं. लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे कृत्य समाज में सम्पन्न वर्गों में देखने को मिलते हैं . इन्हीं लोगों द्वारा आजकल ये बात आम तौर पर सुनने को मिल जाती है कि हमारे समाज में पश्चिमी सभ्यता का असर हो गया है और वृद्धाश्रम भी उसी विकृति का एक हिस्सा है. लेकिन ऐसे लोग एक बात भूल जाते हैं कि पश्चिमी देशों की तुलना में हमारी संस्कृति और सभ्यता बिलकुल अलग है.
                                       पश्चिम में बच्चे बालिग होने के साथ ही स्वतंत्र हो जाते हैं और अपनी जिम्मेदारी खुद उठाते हैं. वो माँ बाप को घर से नहीं निकालते, बल्कि माँ-बाप का घर खुद ही छोड़ देते हैं. इसके उलट हमारे यहाँ हमारी सभी जरूरतों को चाहे वो  अपनी पढ़ाई को पूरी करने तथा कमाई शुरू करने और उसके बाद तक का ध्यान अभिभावकों द्वारा रखा जाता है. यहाँ बच्चों को पालने - पोसने की एक परंपरा और संस्कृति है.  इसके लिए माता-पिता अपने जीवन में कोई कसर नहीं छोड़ते और अपने भविष्य की चिंता किये बिना अपनी सारी कमाई अपने बच्चों पर खर्च कर देते हैं. उनकी अचल सम्पति पर भी बच्चे स्वतः ही अपना अधिकार समझने लगते हैं.यह एक कड़वा सच है कि बुजुर्गों की संपत्ति तो हम लेना चाहते हैं, लेकिन उनके जीवन के बचे चंद लम्हों में उन्हें भावनात्मक सहारा नहीं देना चाहते हैं. आखिर यह कैसा चारित्रिक दोहरापन है, जो हमारे ही बुजुर्गों को पीड़ा पहुंचाने को उत्सुक  रहता है? आज हम एकल परिवार को ज्यादा महत्व दे रहे हैं और एकल परिवार का मतलब पति-पत्नी और बच्चे हैं. ऐसे में, बच्चों के बड़े होने पर उनके रोजगार की तलाश में बाहर जाने पर जाहिर सी बात है माता-पिता अकेले रह ही जायेंगे. और विवाह के बाद तो बच्चों और रोजगार के चलते माँ बाप से मिलना भी दूभर हो जाता है. ऐसे में माँ-बाप बोझ लगने लगते हैं और यहीं से शुरू होता है उनसे पीछा छुड़ाने का सिलसिला.पहले के समय में संयुक्त परिवार में सब साथ रहते थे इसलिए एक दूसरे की मदद और सेवा की चिंता नहीं होती थी. 
                                  पहले लोगों का खेती और पारम्परिक व्यवसाय होता था जिससे युवाओं को कहीं बाहर जाने की जरुरत भी नहीं होती थी. अब वो समय नहीं रहा, क्योंकि खेती से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं, तो स्थानीय तौर पर सरकार की गलत नीतियों के कारण रोजगार का भारी संकट खड़ा हो गया है और फिर रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन इस विकराल होती समस्या का एक बड़ा कारण बन गया है. हालाँकि, कुछेक मामले ऐसे भी सामने आते हैं, जब बुजुर्ग की ज़िद्द और तानाशाही,व्यवहार के चलते बच्चे उनसे तालमेल नहीं बिठा पाते हैं. लेकिन ऐसे मामले बेहद ही कम हैं और किसी 60 साल से ज्यादा के व्यक्ति की आदतों को बदलने की बजाय बच्चों को बर्दाश्त करना और तालमेल बिठाना सीखना चाहिए, क्योंकि कल वह खुद भी बुजुर्ग होंगे और फिर कैसा लगेगा, अगर उनका अपना ही बच्चा उन्हें घसीटकर, बेरहमी से वृद्धाश्रम की ओर छोड़ आएगा. बीते जमाने के जाने-माने फिल्‍म डायरेक्‍टर और प्रोड्यूसर राजेश नंदा का ही किस्से ले लीजिये उनका आकुर्डी के एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया. उनकी उम्र 80 साल थी. बताया जा रहा था कि कई सालों से राजेश नंदा का उनके परिवारवालों और रिश्‍तेदारों से संबंध टूटा हुआ था. सबसे दर्दनाक बात तो यह रही कि जब राजेश नंदा के निधन की सूचना आश्रम की ओर से उनके परिजनों को दी गई तो कोई भी उनके अंतिम संस्‍कार के लिए नहीं आया. हद तो तब हो गयी जब उन्होंने नंदा को पहचानने से भी इंकार कर दिया .
                                  ऐसे में,हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि क्यों न हम इस सामाजिक संरचना में बेहतर मार्ग ढूँढ़ने का प्रयत्न करें तो तमाम सरकारें बजाय इसके कि व्यक्तिगत रूप से वृद्धों की समस्याएं हल करने के, इस पर एक व्यापक नीति का निर्माण करें, जिससे हमारा समाज वृद्धों पर अत्याचार करने का दोषी न बने.
 
 
रुपाली झा 

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