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मुस्कुराना जरूरी है

मुस्कुराना भी जरूरी है . मुस्कुराने से खुद के मन को तो सुकून मिलता ही है सामने वाले के मुखमण्डल पर भी प्रसन्नता का भाव देखने को मिलता है .जितना ज्यादा मनुष्य बोलता है यदि उससे ज्यादा हँस ले तो मनुष्य का मन, मस्तिष्क दोनों सुचारू रूप से कार्य करेगे . मनुष्य को बोलने से ज्यादा मुस्कुराना चाहिए.ज्यादा बोलने से मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा घटती है .जिससे मनुष्य किसी अन्य कार्य को उतने अच्छे तरीके से नही कर पाता है. क्योकि अधिक बोलने से उसकी शारीरिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है.एक वैज्ञानिक पहलू भी है ज्यादा बोलने का .वैज्ञानिको के मतानुसार जो लोग ज्यादा बोलते है उन लोगो में ज्ञान की कमी होती है मुकाबले उनके जो लोग कम बोलते है .ऐसा इसलिए क्योकि ,किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए मनुष्य का मस्तिष्क थोड़ा समय लेता है तभी जाकर किसी सही निष्कर्ष पर पहुच सकता है. जो लोग ज्यादा बोलते है उन्हें बोलने की आदत बन जाती है . उसी आदत के चलते वो अपने मस्तिष्क को विचारने का पर्याप्त समय नही दे पाते है .जिससे मस्तिष्क सही निष्कर्ष तक पहुच ही नही पाता .कम बोलने वाले मनुष्य प्रश्नों और ज्ञानप्रदायको को बहुत ध्यान से सुनते है और उनसे प्राप्त ज्ञान को मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस भाग तक पहुँचा देते है.वो ज्ञान मस्तिष्क के सबकॉन्सियस भाग में सुरक्षित रहता है. फिर जब कभी उससे सम्बन्धित प्रश्न कही पूछा जाता है तो मस्तिष्क सही उत्तर ही देता है. कभी कभी प्रश्न से मिलता-जुलता उत्तर  भी दे देता है .क्योकि प्रश्नों का ज्यादा अध्ययन ना करने से मस्तिष्क के न्यूरोन कर्ण ठीक प्रकार से आपस में नही जुड़ पाते है इसीलिए मनुष्य प्रश्न का सटीक उत्तर ना देकर मिलता -जुलता उत्तर देता है .कम बोलने वाले मनुष्य में दूसरो से मिले ज्ञान को सुनने की उत्सुकता अधिक होती है. और प्रश्न का सही उत्तर देने की क्षमता भी कई गुना ज्यादा होती है. 2004 की रिसर्च बताती है कम बोलने वाले व ज्यादा हँसने वाले मनुष्य मानसिक रूप में ज्यादा बोलने वालो से कई गुना स्वस्थ थे.उसी समय से लाफ थैरिपी का प्रचलन भी काफी बढ़ा. आज बच्चा बच्चा इस थैरिपी को जानता है . डॉक्टर,इंजिनीर्स, उच्च ओहदा प्राप्त मनुष्य इस थैरिपी को प्रतिदिन मस्तिष्क को स्वस्थ बनाए रखने कई लिए प्रयोग करते है .