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त्रुटि निकालना सरल है

त्रुटि ,ये शब्द सुनने में ही खराब लगता है. त्रुटि शब्द सिर्फ और सिर्फ पीड़ा पहुचाता है . इसने ये गलत कर दिया, उसने वो गलत कर दिया.तुम ही ने तो सारा काम खराब कर दिया. जिधर देखो उधर त्रुटि शब्द सुनने को मिल जाएगा . पर ये शब्द खुद के लिए कभी नही कहे जाते . इन शब्दो का प्रयोग मनुष्य दूसरो के लिए ही करता है.क्योकि, स्वयं को सर्वगुण सम्पन्न जो  समझता है .बहुत  कम मनुष्य आपको ऐसे मिलेंगे जो खुद की कमी को पहचान कर उसमे सुधार करते है.वरना अधिकतर मनुष्य तो अपनी त्रुटियों को भी दूसरो पर थोपते है .पर एक बात ध्यान रखे...किसी में भी त्रुटि निकालना बेहद सरल कार्य है .जो तकरीबन सभी करते है .लेकिन खुद कुछ अच्छा काम करना बेहद मुश्किल होता है .त्रुटि को ईर्ष्या रूप में भी समझ सकते है .चलिए एक उदाहरण द्वारा समझते है - मार्ग में जाती एक सुंदर युवती को देखते ही अन्य युवतियां ईर्ष्या करती है .और अपनी ईर्ष्या को कम करने के लिए उस पर हंसना शुरू कर देती है या तंज कस्ती है और फिर भी ईर्ष्या शांति नही होती तो त्रुटि निकलना नही भूलती है.जिससे ये जाहिर होता है कि,आप एक गुणी है . और अन्य मनुष्यो मे ये गुण नही है इसीलिए अन्य आपमें त्रुटि निकालकर मन ही मन खुश होते है. प्लूटार्क ने त्रुटि के सम्बन्ध में कहा है- 
                  "त्रुटि निकालना सरल है, परन्तु अच्छा काम करना काफी कठिन होता है "
एक और मुख्य बात जानकारी रूप मे बता दे , गुणी कभी किसी मे कमी नही निकालते .वो सदैव खुद मे ही सुधार करते है . स्वयं की कमियों को खोजकर उसमे सुधार करते है .इतना ही नही मूर्खो से ऐसे मनुष्य कभी सिर नही मारते.क्योकि ,मूर्खता मूर्ख का व्यवहार है वो बुद्धिमान को भी मूर्ख बना देता है.आपने देखा होगा मूर्ख से आप किसी भी सन्दर्भ में बात कर लीजिये .बिना उस विषय में ज्ञान होते हुए भी बहस करने से बाज नही आते है .हर हल में मूर्ख खुद को ही सही ठहराते है . एक और रूप मे समझ सकते है त्रुटि शब्द को ....जब कोई आप मे त्रुटि निकालता है यानी,आप अपनी त्रुटियों से परिचित हो रहे है .और यकीनन आप अपनी कमियों मे सुधार करते है . क्योकि आप पहले से ही गुणी थे और त्रुटियो में सुधार करते  रहने से गुणी से परम गुणी बन जाते है .ऐसे मनुष्य सभी जगह आदर पाते है.