Loading

Enquiry
articale
digital advertising
Contact Form

जीत और हार

जीत और हार शब्द से सभी परिचित है . जीत ... ये शब्द सुनने में कितना अच्छा लगता है .ये शब्द मन को बहुत आनन्दित करता है .वही हार शब्द मन को अंदर तक बोझिल बना देता है .मनुष्य शांति में भी शांति से नही रह पाता है . क्योकि मनुष्य हार शब्द में खो जाता है . लेकिन जीवन में हार , जीत दोनों चलती ही रहती है .कभी हम जीत जाते है ,तो कभी कोई हम से जीत जाता है .हार और जीत से हर मनुष्य का रिश्ता पुराना है .इसीलिए हार से मत घबराए .सदा जीत के लिए प्रयास करते जाए . हार और जीत दोनों मन के मानने से होती है .यदि मन में ठान लो तो जीत निश्चित है ,यदि मन से  हार मान लो तो हार निश्चित है . मन के हारे हार है ,मन के जीते जीत .मन में ठानी है तो सफलता मिलनी निश्चित है . एक प्रयास में नही ,तो दूसरे प्रयास में , दूसरे में नही तो तीसरे प्रयास में . पर जीत अवश्य मिलेगी . मनुष्य को सिर्फ अपना मन समझना होता है.मन , मस्तिष्क को अपने आप समझा लेता है . तभी तो जीत और हार मनुष्य रूपी मन से ही होती है .इसे एक उदाहरण रूप में समझिये ..... एक बच्चा जिसे कड़वी दवा खाना बिल्कुल पसन्द नही है .उस बच्चे को उसकी माँ जबरन दवा देने का प्रयास करती है .तो बच्चा बोलता रहता है .मै कड़वी दवा नही खा सकता मुझे उलटी हो जाएगी .क्योकि बच्चा सोच के बैठा है. कड़वी दवा से मुझे उल्टी जरूर होगी .असल मेँ बच्चे को उलटी नही होती बल्कि उस स्थिति मेँ बच्चा मुँह से कड़वी दवा बाहर निकाल देता है .क्योकि वो पहले से ही सोच लेता है ,इस कड़वी दवा से मुझे उलटी हो जाएगी . इस उदाहरण से आपको हार जीत का सारा सार आपको समझ आ गया होगा . इसीलिए हर अच्छी और विपरीत परिस्थिति में जीत की ही भावना जगाए रखे. ये भावना ही आपको जीत दिलाएगी .