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मंजिल आँख से अख़बार तक

मंजिल , जो हर एक की होती है .हर एक मनुष्य मंजिल को पाना चाहता है .एक के बाद दूसरी मंजिल ,दूसरी से तीसरी ,बस यही सिलसिला चलता रहता है पूरे जीवन चक्र में. कुछ को मंजिल मिल जाती है .कुछ की आधे में रह जाती है ,तो कुछ की दूर -दूर तक नही पाती है .जिनको मंजिल मिलती है वो थकना नही जानते ,वो रुककर भी रुकते नही .ऐसा नही है कि , उसको राह में  परेशानी नही आती . या उनको चिंता नही सताती .पर वो रुकना नही जानते है .वो हर क्षण बढ़ते है . अपना नाम करते है .जो अपनी मंजिल को आखों में रखते है .वो सफलता को हासिल करना कभी नही भूलते है .एक कहानी के माध्यम से इसे समझिये - विवेकानंद का मन ध्यान में ज्यादा लगता था .वो जिस भी यात्रा पर जाते अपने खाली समय में ध्यान साधना करते थे .स्वामी जी का एक सेवक था. जो बोलने में बहुत बातूनी था .कई बार तो वो स्वामी जी को भी बीच में रोकने का प्रयास करता था .जिससे अन्य सेवक भी उससे परेशान हो जाते थे .वो स्वामी जी के विषय में कभी कभी कहा करता था कि स्वामी जी रोज ध्यान साधना में ही लीन रहते है .इनके जीवन का उद्देश्य सिर्फ ध्यान ही है क्या ? क्योकि उसे बोलने की आदत थी तो ,उसी आदत के चलते उसने स्वामी जी से ही पूछ लिया.आपकी मंजिल सिर्फ ध्यान ही है क्या ? स्वामी जी मुस्कुराए और बड़े अनुराग के साथ उत्तर देते हुए बोले .... जब मैं ध्यान में होता हूं तो अपनी मंजिल को स्पष्ट देख लेता हूं. क्योकि वो मंजिल मेरे मस्तिष्क में कैद हो जाती है .फिर मै हर हल में उसे पाने की पुरजोर कोशिश करता हूं .इस कहानी का सार है कि,जो लक्ष्य हम आखों में बसा लेते है .वो पूरा जरूर होता है .मनुष्य की आखों से देखी गयी कामयाबी उसे अख़बार तक पहुचाती है .जिसकी लोगो द्वारा प्रशंसा होती है .