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मातृभाषा का सम्मान और विकास जरुरी है

स्वामी विवेकानंद का नाम दिमाग में आते ही सभी का मन सम्मान से भर उठता है वो प्रेरणा के अपार स्रोत थे । उनकी कही हर एक  बाते हमें प्रेरणा से भर देती है । उनकी बातो में जैसे एक जादू था जो आज भी हमें ऊर्जा से भर देता है । उनके बारे में प्रचलित बातो में से एक का जिक्र करता हूँ वो विदेशो में भाषण हिंदी में दिया करते थे न जाने  उनकी बातो में क्या जादू था की जो हिन्दी न भी समझता हो वो भी उनकी बातो के पाश में बंध जाता था । इस बात से हमें दो चीजे सिखने को मिलती है एक तो वाणी में मिठास और ऊर्जा होनी चाहिए और दूसरी अपनी भाषा को छोटा नहीं समझना चाहिए स्वामी विवेकानंद ने हिंदी भाषा को अपनाया और हमेशा उसका सम्मान किया आज हम अपनी भाषा के विकास को छोड़कर दुसरो की भाषा को अपनाने में लगे है मै ये नहीं कहता की दूसरी भाषाओ को सिखने में कोई बुराई है परन्तु अपनी भाषा छोड़कर दूसरी भाषा अपनाना गलत है ये अपमान है मातृभाषा का और उस देश का जिसकी वो मातृभाषा है और वहाँ के लोगो का जो अपनी बालयवस्था से उसे बोलते आये है हम जिनकी भाषा को अपनाना चाहते है वो भी तो अपनी मातृभाषा के विकास के लिए प्रयत्न कर रहे है फिर हम क्यों ऐसा नहीं कर सकते हम दुसरो को हमारी भाषा अपनाने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते । मातृभाषा के विकास के लिए जरुरी है सर्वप्रथम  हम उसका सम्मान करे ।