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मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ?

हम सभी का यह प्रश्न होता है -स्वयं से, अपने आप से की मै कौन हूँ ? हमें इस प्रश्न के बहुत से उत्तर मिलते है  कभी संतुष्ठ और कभी असंतुष्ठ, लेकिन ये सवाल हम कभी स्वयं  से नहीं करते -उसे आज करना है, अभी करना है मैं कौन हूँ ? इसे शांत , स्थिर, एकाग्र मन से पूछना है , स्वयं से मै कौन हूँ? इस सवाल को अपने मे गूँजने दो । इसे गहराई मे उतरने दो , ज्यो ज्यो यह सवाल गहराई मे गूंजेगा, सारे भय और भ्रम निकलते जायेगे  । गहराई मे उतरते उतरते सारा अज्ञान विलीन हो जायेगा और स्वयंसे आमना - सामना हो जायेगा  । अनुभूति हो पायेगी स्वयं की , स्वयं के भीतर देखते हुए । प्रश्न  स्वयं  अपना उत्तर खोज लेगा  । यही द्वार है , यही मार्ग है , यही मंजिल है । 

लेकिन इस प्रक्रिया मे उतनी ही तीव्रता होनी चाहिए जितने की किसी भी भौतिक इच्छा की पूर्ति मे हम ललायित रहते है । यानि हमें इस प्रश्न  के सस्ते उत्तरो को , उधार के उत्तरो  को पूरी तरह अस्वीकार करना है । उत्तर के रूप मे स्वीकार करना है  तो सिर्फ अपनी अनुभूति को अपने स्वयं के उत्तर को खोजना है हमारा वर्तमान व्यक्तित्व भी तो हमारे अब तक किये गए विविध अभ्यासों का ही कुल योग है   । यह अभ्यास है योग का , आत्मा का परमात्मा से जुड़ाव का , प्रभुमिलन हेतु प्रयास का , अपने वास्तविक स्वरूप को याद करने का - जिसे हम भूल चुके है । जो कुछ घटित हो उससे तुरन्त प्रभावित नहीं होना चाहिये पहले स्वयं मे केंद्रित होना चहिये, फिर उस केन्द्रस्थ दशा मे आस-पास देखना चहिये और फिर निर्णय लेना चाहिये ।

कोई हमारा अपमान केर देता है और हम उस अपमान द्वारा धकेल दिए जाते है । हम अपने केंद्र से भटक कर गलत निर्णय लेते है , जबकि सबसे पहले हमें  स्वयं के केंद्र मे स्थित होना चाहिये तथा निर्णय करना चाहिये । ऐसा होने पर एक रूपांतरण घटित होता है । सारा परिप्रेक्ष्य और परिदृश्य बदल जाता है फिर अपमान  अपमान न लगकर एक मूर्खतापूर्ण घटना लगती है  । जिस प्रकार वृक्ष केवल उसी चीज का स्वागत करता है जो उसकी अपनी जड़ो से आती है जिसका आगमन होता है उसके आतंरिक अस्तित्व से और जो अंतरंग हृदय से आता है तो फूल उसकी आत्मा बन जाता है और फूल के द्वारा वृक्ष अपना नृत्य और गान अभिव्यक्त करता है , उसका सारा जीवन अर्थपूर्ण बन जाता है  । बस ऎसे ही की मैं कौन हूँ ? इस प्रश्न का उत्तर आएगा  । अपनी स्वयं के जड़ो से । तभी हम उसके संग नृत्य कर पाएंगे , गीत गा पाएंगे  । अपनी स्वयं के अनुभूति से आंदोलित हो पाएंगे यानि आनंदित हो पाएंगे । 

बस इसे लंबे समय तक और  निरंतर करना है  और करते रहना है , बिना रुकाव के । इस सत्य को याद रखना है । अगर हम अपने अभ्यास का क्रम भंग करते है और फिर कुछ समय के लिए करते है और फिर कुछ समय के लिए छोड़ देते है तो सारे प्रयत्न खो जाते है तो अभ्यास की गिनती न करके अभ्यास की गहराई में जाना होगा , यही निरंतरता हमें बोधपूर्ण और होशपूर्ण बनाती है   ।