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आलोचक भी जरूरी है

आलोचना शब्द आते ही मनुष्य आग-बबूला हो जाता है. वो भूल जाता है यदि आज आपकी आलोचना हो रही है तो आपने भी दूसरो की आलोचना जरूर की होगी. यूं ही कोई किसी की आलोचना नही करता अब्राहिम लिंकन ने इस पर कहा है कि,
                  " किसी की आलोचना मत करो 
                    जिससे आपकी भी ना हो सके "
आलोचना यानी, त्रुटि निकलना . आलोचना के विषय में प्लूटार्क ने भी कुछ इसी प्रकार से कहा है. 
                    "त्रुटि निकलना बेहद सरल है पर 
                     अच्छा काम करना बेहद मुश्किल है"
आलोचना को आप जलन के रूप में भी समझ सकते है. मनुष्य जब स्वयं उस जगह तक नही पहुच पाता है, तो आलोचना को अपना सहारा बनाने की कोशिश करता है. आलोचना करके मनुष्य खुद को शांत जरूर कर लेता है पर अपनी प्रगति का मार्ग स्वयं रोक देता है .जो मनुष्य जितना ज्यादा काबिल होता है. उसकी आलोचना उतनी ही ज्यादा होता है. क्योकि उसकी क़ाबिलियत को दूसरे मनुष्य बर्दाश नही कर पाते है और आलोचना के रूप में अपने भीतर के क्रोध को बाहर निकलते है . कभी गौर करना जो मनुष्य किसी औधे पर नही होता ,किसी बड़ी मंजिल तक नही पहुँचता.उसे अन्य मनुष्य दया की दृष्टि से देखते है ,केवल उसी के लिए बेचारा शब्द का प्रयोग करते है. अन्य मनुष्य इसलिए इस प्रकार का व्यवहार करते है क्योकि,अंतर करने के लिए उस मनुष्य के पास कुछ है ही नही .जब अंतर नही तो मुकाबला कैसा, फिर कैसी जलन , और कैसी आलोचना ? प्रकृति ने सभी चीज़ों को सोच समझ के बनाया है हर शब्द का मोल अलग लगाया है इसीलिए आलोचना भी जरूरी है क्योकि मुर्ख मनुष्य ईर्ष्यावश आपकी आलोचना करते जाएगे और आप उसमे सुधार करते जाएंगे .और वो आलोचक वही रह जाएंगे . इसीलिए आलोचक बहुत जरूरी है ,जीवन को बुलंदी तक ले जाने की यही सीढ़ी है .